श्री रामायण तनि श्लोकम् – ५ – बाल काण्ड १९.१४ – अहं वेद्मि – भाग ४

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः

पूरी श्रृंखला

<< भाग ४

अहं वेद्मि, (बाल काण्ड १९.१४); भाग ४

अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ।। १.१९.१४ ।।

यह श्लोक विश्वामित्र महर्षि ने राजा दशरथ से कहा है।

सरल अर्थ – मैं श्री राम को जानता हूँ एवं वशिष्ठ भगवान और अन्य महर्षिगण, श्री राम की महानता को जानते हैं|

पिछले भाग तक हमने ‘महातेजा’ विशेषण से वशिष्ठ भगवान की महानता का वर्णन पढ़ा था। इसी क्रम में आगे हम वशिष्ठ भगवान एवं अन्य ऋषियों की अन्य महानताओं को पढ़ेंगे।

पेरियवाच्यान् पिळ्ळै (आचार्य श्री कृष्ण)  के व्याख्यान से

ये चेमे– अन्य भी, जो यहाँ उपस्थित हैं।                                                                                                                    
तपसि स्थिताः – वे तपस्वीगण / ऋषिगण। 

निम्न प्रमाण बताते हैं कि राजा दशरथ को विश्वामित्र मुनि के समर्थन में कहे गये वशिष्ठ भगवान के शब्दों को क्यों मानना चाहिए- 

  • “यद् ब्राह्मणश्चाब्राह्मणश्च प्रश्नमेयातां ब्राह्मणायाधिब्रूयात्” (तैत्तरीय संहिता २.५.११.९) (जब दो पक्षों के मध्य वाद हो और न्याय दोनों ही पक्षों के साथ हो, यदि उन में से एक पक्ष ब्राह्मण का हो तब न्याय ब्राह्मण के पक्ष में होना चाहिए।)
  • मनु स्मृति ११.७९  – “ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सद्यः प्राणं परित्यजेत्” (ब्राह्मण एवं गौ के लिए शीघ्र प्राणों तक का परित्याग करना चाहिए।
  • सम्भवतः दशरथ महाराज ऐसा सोच सकते हैं कि इन उपरोक्त कारणों से वशिष्ठ महाराज विश्वामित्र मुनि के पक्ष में बोल रहे हैं एक राजा की उपेक्षा कर। महाराज दशरथ के मन‌ में इस प्रकार का विचार अथवा प्रश्न आ सकता है ऐसे यहाँ, पेरियवाच्यान् पिळ्ळै पूर्वानुमान करते हैं, अतः निम्न उत्तर दे रहे हैं।

ये चेमे तपसि स्थिताः

  • विश्वामित्र महर्षि कहते हैं यदि राजा दशरथ महर्षि वशिष्ठ से सहमत न हों, तब भी इन महर्षियों की बात पर विश्वास कर सकते हैं, क्योंकि वे तपस्वी एवं सत्यवादी हैं।
  • महर्षिगण भी श्री राम के वास्तविक स्वरूप को जानते हैं, इसलिए विश्वामित्र मुनि से सहमत होते हैं।
    • ये महर्षिगण ऐसे बुद्धिमान पुरुष हैं, इसलिए नृप को इनकी बातों पर विश्वास करना चाहिए।
  • विश्वामित्र मुनि कहते हैं कि राजा दशरथ को यह सोचकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है कि राम छोटे आयु के हैं और युद्ध के योग्य नहीं हैं। इसका संदर्भ श्री रामायण बाल काण्ड २०.२ 

“ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:। 

न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।।”                                                                                                                                                          (राम की आयु अभी १६ वर्ष भी नहीं हुई हैं।)

  • पुरुष सूक्त में कहा है “तस्य धीराः परिजानन्ति योनिम्” (ज्ञानियों में कोई बुद्धिमान ही भगवान के अवतार रहस्य को जानते हैं।)
    • ये महर्षिगण ऐसे बुद्धिमान पुरुष हैं, इसलिए नृप को इनकी बातों पर विश्वास करना चाहिए।

इमे – ये ऋषिगण (ये – अर्थात ‘इतने प्रमुख न होते हुए’)

  • पुलस्त्य, अगस्त्य, पराशर, व्यास आदि जो प्रधान आचार्य पदवी में स्थित विख्यात हैं, उनके विपरीत इन ऋषियों ने अपने प्रसिद्ध पद की प्राप्ति नहीं की है। उसकी इच्छा नहीं की है। इसलिए विश्वामित्र महर्षियों की ओर इंगित करते हुए कहते हैं ये ऋषिगण प्रसिद्ध या पद की इच्छा से कुछ भी नहीं कहेंगे इसलिए ये विश्वासपात्र हैं।
  • विश्वामित्र आगे कहते हैं कि मुझे इन ऋषियों के विषय में विशेष रूप से बताने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि ये ऋषि केवल भगवदनुभव के लिए ही जीते हैं, सांसारिक वस्तुओं, पद या प्रसिद्धि के लिए नहीं। यह उनके रूप देखने से ही स्पष्ट हो जाता है।
    • ऋषिगण श्वेत केशों (सांसारिक वैराग्य को दर्शाता हुआ) में, बलहीन हनु, धँसे हुए / गड्ढे युक्त गोल गाल (कपोल), सिकुड़ी/सुखी त्वचा, बलहीन शरीर, सतत जप करने वाले हाथ, सदैव मन्त्र जपता हुआ मुख, अश्रुपूर्ण नयन (परमानन्द का अनुभव करते हुए), सदैव परब्रह्म का ध्यान करते हुए एवं दिव्य अनुभव के कारण रोमांचित दिखाई देते हैं। ये संकेत हैं कि ये ऋषिगण निष्कपट एवं सत्यशील हैं। इसका उदाहरण विष्णु तत्त्व में प्राप्त होता है । “आह्लादशीतनेत्राम्बुः पुलकीकृतगात्रवान् । सदा परगुणाविष्टो द्रष्टव्यः सर्वदेहिभिः।।” (भगवदनुभव से आनन्दयुक्त अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, पूरे शरीर में रोमाँच अनुभव करने वाले, सदैव भगवान के कल्याण गुणों का ध्यान करने वालों का दर्शन सभी मनुष्य शरीर धारण करने वालों को करना चाहिए।)

दूसरा अभिप्राय – इमे – ये ऋषिगण हमारी वाणी या विचार के परे हैं। इसलिए (ये) सम्बोधन से मात्र अंगुली से इंगित करते हुए कहते हैं।

  • विष्णुचित्त (पेरियाऴ्वार्) यशोदा भाव में चन्द्रमा की ओर देखते हुए कहते हैं – पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि (विष्णुचित्त सूक्त) १.४.८ “चिऱियन् ऎन्ऱु ऎन् इळञ् चिङ्कत्तै इगऴेल् कण्डाय् चिऱुमैयिन् वार्त्तैयै मावलियिडैच् चॆन्ऱु केळ्” (“लघुरिति मम इमं तरुणसिंहमवज्ञातुं मा कुरु। लघुतायाः वचनं महाबलेः समीपं गत्वा पृच्छ।”) (कृष्ण को छोटा बालक मत समझो। इसकी महिमा के विषय में महाबली चक्रवर्ती से पता कर लो।) महर्षि विश्वामित्र कहते हैं आपको पाताल लोक जाकर महावली चक्रवर्ती से पूछने की आवश्यकता नहीं है। आप इन ऋषियों से ही पूछ सकते हैं।
  • असुरकुल के महाबली की तुलना में इन सत्वपरिपूर्ण ऋषियों से सुनना अधिक उत्तम है। 
  • ये बड़ी संख्या में हैं केवल इस कारण नहीं, अपितु इस कारण से भी क्योंकि ये तपस्वी हैं। “भूयसां स्याद् बलीयस्वम्” (मेरी और वशिष्ठ ऋषि की तुलना में इन ऋषियों की संख्या बड़ी है; कुछ लोगों की तुलना में बहुतों का मत विश्वसनीय होता हैं।)
  • निम्न प्रमाण ‘तपस्’ शब्द को परिभाषित करते हैं एवं तपस्वियों की महिमा का वर्णन करते हैं।
    •  “तपो दानं तपस्सत्यं तपो धर्मः प्रतिष्ठितः”  (दान करना तप है, सत्य तप है और वर्णाश्रम धर्म का पालन करना तप है)। “तपसि स्थिताः” (सदा अपने शरीर से कष्ट सहते हुए)। अतः ये ऋषि तपस्वि होने के कारण सत्य ही बोलेंगे।
    • मुरारी कवि अनर्घराघवम् १.१७ में कहते हैं – “हुतमिष्टं च तप्तं च धर्मश्चायं कुलस्य ते । गृहात्प्रतिनिवर्तन्ते पूर्णकामा यदर्थिनः।।” (अतिथि सत्कार योग, तप एवं धर्म के समतुल्य है)। ये तपस्वी यहाँ उस श्रेणी के हैं इसलिए तपस्वी हैं।
    • तपः सन्तापे’ मूल धातु से व्युत्पन्न ‘तप’ शब्द (ताप देना, पीड़ा देना, दाह करना) को निम्न प्रमाण से बताया गया है –  “यज्ञेन दानेन तपसा” (बृहदारण्यक ६.४.२२)  (ब्राह्मण यज्ञ, दान एवं तप के द्वारा ब्रह्म का अनुभव करने की चेष्टा करते हैं।) यामुनाचार्य (आळवन्दार्) भी गीतार्थ संग्रह -२३ में कहते हैं – “कर्मयोगस्तपस्तीर्थदानयज्ञादिसेवनम्। ज्ञानयोगो जितस्वान्तैः परिशुद्धात्मनि स्थितिः ॥ २३॥” (तप, पुण्य तीर्थों में स्नान, दान, याग कर्म योग के अंग हैं।) ये तपस्वी होने के कारण कर्म योग में स्थिर/अचल हैं।
    • “तपः आलोचने” मूल धातु से ‘तपस्’ शब्द (“चिन्तन”, “मनन”, “आत्मविमर्श”) को निम्न प्रमाणों के द्वारा समझाते हैं। “आत्मानं तत्वतो ज्ञात्वा” (आत्मा को जैसा है वैसा जानकर)। “आत्म-याथात्म्य-ज्ञान-पूर्वकम्” (आत्मा के सत्य को जानकर भक्ति का बीजारोपण करना।) इन उपरोक्त प्रमाणों में जैसे कहा गया है, ये ऋषिगण ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध हैं एवं ज्ञान योग में निष्ठ हैं। ये सारे विषयों को स्पष्ट रूप से इन ऋषियों के सद्गुणों को दर्शाने के लिए समझाया गया है। 
    • ‘तपः ऐश्वर्ये’ मूल धातु से ‘तपस्’ शब्द (तेज, प्रभाव, आध्यात्मिक शक्ति) का अर्थ निम्न प्रमाणों के द्वारा बताते हैं –
      • मनु स्मृति २.१२ – “प्रशासितारं सर्वेषाम्” (जो सबका शासन करता है।) 
      • छान्दोग्य ५.१०.१ – “ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते” (जो वन में निवास कर तपस् मूर्ति स्वरूप सर्वेश्वर की आराधना करते हैं।)
      • सहस्रनामाध्यायम् – “परमं यो महत्त्पः।” (सर्वोच्च तप रूप परमेश्वर)
    • अतः इन प्रमाणों के द्वारा ‘तपस्’ शब्द की व्याख्या से यह अर्थ प्राप्त होता है कि ये ऋषिगण ज्ञान योग एवं भक्ति योग से युक्त थे।
  • तपसि स्थिताः – इसकी ‘वाचिक तपस्’ भी व्याख्या की जाती है। वेदों के नित्य पाठ से ऋषि निरन्तर वाचिक तपस् में प्रवृत्त है। तैत्तिरीय उपनिषद – “तद्धि तपस् तद्धि तपः”  वेद पाठ स्वयं तपस् हैं। 
  • तपसि स्थिताः – ये ऋषि सदैव परभक्ति, परज्ञान एवं परमभक्ति के मार्ग में सुलग्न हैं।
  • तपसि स्थिताः – निम्न प्रमाणों से ये ऋषि सदैव परब्रह्म के समाश्रित हैं – तैत्तिरीय उपनिषद् , नारायणवल्ली ५०- “तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः ॥” (सदैव नित्य रूप से शरणागति में स्थित होना – जो सभी तपो में सर्वोच्च है।)
  • अर्हिबुधन्य सम्हिता- “तेषां तु तपसां न्यासमतिरिक्तं तपः श्रुतम्।।” (शरणागति सर्वोच्च तप है।)
  • अतः ‘तपसि स्थितः’ श्लोकांश की अनेक प्रकार की व्याख्याएँ हैं। दशरथ महाराज की सभा में ऋषिगण इन सभी व्याख्याओं के समीचीन है।

इस प्रकार इस श्लोक की व्याख्या पूर्ण हुई।

अब पेरियवाच्चान् पिळ्ळै श्रीरामायण बाल काण्ड २०.२ की व्याख्या प्रारम्भ करते हैं।

“ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।।”

महर्षि विश्वामित्र द्वारा पूर्व में दृढ़ व्याख्यान देने के पश्चात भी दशरथ महाराज के मन जो शंकाएँ हो सकती हैं, उनके प्रत्युत्तर के रूप में इस श्लोक का स्पष्टीकरण देखा जा सकता है। राजा दशरथ इस श्लोक में कहते हैं उनका राजीवलोचन, कोमलवदन राम अभी १६ वर्ष का भी नहीं हुआ है। अतः वे राम को राक्षसों से युद्ध करने योग्य नहीं समझते।

न पश्यामि – मैं नहीं देखता हूँ। 

ऋषि विश्वामित्र नृप दशरथ से कहते हैं कि श्री राम बाह्य नेत्रों से नहीं देखे जा सकते। इस कारण वे कह रहें हैं कि वे राम को युद्ध के योग्य नहीं देखते। विश्वामित्र इसका प्रत्युत्तर देते हैं – ‘अहं वेद्मि’। (मैं राम को जानता हूँ।)

ऊनषोडषवर्षः – सोलह वर्ष से भी कम – राजा दशरथ कहते हैं कि श्री राम अभी सोलह वर्ष से भी कम आयु के हैं। महर्षि विश्वामित्र उत्तर देते हैं – ‘महात्मानम्’। (श्री राम महात्मा हैं, इसलिए उनकी योग्यता को उनकी आयु से नहीं आँकना चाहिए।)

मे रामः – मेरे राम

महर्षि विश्वामित्र कहते हैं कि ‘मे रामो’ वाक्यांश से आप मोहवश हो रहे हैं। वे समझाते हैं कि श्री राम सभी के लिए हैं; दशरथ को ऐसा नहीं समझना चाहिए कि राम केवल उन्हीं के हैं। श्री रामायण अयोध्या काण्ड २.४४ – “रामो लोकाभिरामोऽयं” (जो सभी को आनन्दित करते हैं।)

राजीवलोचनः – कमल सदृश रक्तवर्ण नयन वाले 

राजा दशरथ कहते हैं कि जिस प्रकार कमल रात्रि को अपनी पंखुड़ियों को बंद कर लेता है, उसी प्रकार सूर्यास्त होते ही रात्री को श्री राम के नेत्र भी बन्द हो जाते हैं। दानव तो रात्रि में ही आक्रमण करते हैं। श्री राम उनसे युद्ध कैसे कर सकते हैं। महर्षि विश्वामित्र प्रत्युत्तर देते हैं – ‘सत्यपराक्रमम्’ (श्री राम सुप्त अवस्था में भी दुष्टों का संहार करने में सक्षम हैं।) श्री रामायण सुन्दरकाण्डम् ३८.२५ “स मया बोधितश्श्रीमान्सुखसुप्तः परन्तपः।” (श्री राम सो रहे हों, तब भी दुष्टों का संहार कर सकते हैं।)

अस्य राक्षसैः – अनेक/असंख्य राक्षसों से विश्वामित्र प्रश्न करते हैं कि राम अकेले असंख्य राक्षसों से कैसे युद्ध कर सकते हैं। विश्वामित्र उत्तर देते हैं कि उन्हें इस विषय में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।

  • श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) सहस्रगीति (तिरुवाय्मोऴि) ७.२.३ में कहते हैं – “उट्कुडै असुरर् उयिर् ऎल्लाम् उण्ड ऒरुवने! ऎन्नुम् उळ् उरुकुम्”  (ये वे हैं जिन्होंने असंख्य महाबली राक्षसों का संहार किया) (लज्जया शून्येषदपि मणिवर्णेति वदत्याकाशमेव पश्यति मुह्यति, बलवतामसुराणां प्राणान् सर्वान् भुक्तवन्नद्वितीयेति वदत्यन्तर्द्रवति । नेत्रागोचर ! त्वां द्रष्टुमुपायमनुगृहाण काकुत्स्थ कृष्णेति वदति, दृढध्वज-प्राकारपरिवृतश्रीरङ्गवासिन्नस्या विषये किमकरोः ।। ७.२.३) (थोड़ी भी लज्जा से रहित यह बाला, ‘हे मणिवर्ण!’ यह पुकारती है, आकाश की ओर ड्रारती है, फिर मोहित होती है। हे बलवान् असुरों के प्राण हरण करने वाले अद्वितीय पराक्रमन् ! ऐसा पुकारती है, भीतर से शिथिल होती है, हे आँखों से न दीखने वाले! हे काकुत्स्थ ! आपके दर्शन का उपाय प्रदान कीजिये- ऐसा कहती है, हे सुदृढ़ ध्वजाओं से अलंकृत परिवेष्टित श्रीरङ्गक्षेत्र के निवासिन् ! इस पुत्री के विषय में आपने यह क्या किया ? ॥३१॥)
  • पेरियाऴ्वार् तिरुमोऴि १.२.१६ –  “तिण् कॊळ् असुररैत् तेय वळर्गिन्ऱान्” (दृढान् असुरान् क्षपयन् स वर्धते।) (वह महाबली दैत्यों का संहार करने हेतु बड़े हो रहें हैं)

अन्ततः पश्यामि – की व्याख्या करते हुए, विश्वामित्र जोर देते हुए कहते हैं किस प्रकार दशरथ के  अतिरिक्त सभी जानते हैं कि श्री राम युद्ध के योग्य हैं। पश्यामि – एकवचन का प्रयोग किया है, अर्थात केवल दशरथ। एक वे अकेले ही नहीं जानते हैं। महर्षि विश्वामित्र उत्तर देते हैं बड़ी संख्या के लोगों को (महर्षि वशिष्ठ एवं ये ऋषिगण) विश्वास है कि श्री राम राक्षसों के संहार में सक्षम हैं– “वसिष्ठो ऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः”

अगले  लेख में बालकाण्डम् 20.2 के व्याख्यान का अध्ययन करेगें।

ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।।

अडियेन् माधव श्रीनिवास रामानुज दास।
अडियेन् रमा श्रीनिवास रामानुज दासी।

आधार:  https://granthams.koyil.org/2025/07/03/sri-ramayana-thani-slokam-5-english/

संगृहीत- https://granthams.koyil.org/

प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Leave a Comment