श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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जब पूछा गया, “क्या दोष (भौतिक शरीर) को दूर करने पर आत्मा का सच्चा स्वरूप अत्यंत शुद्ध और आनंददायक नहीं होगा? ऐसे में शरीर का निष्कासन अवांछनीय क्यों है और शरीर स्वयं वांछनीय क्यों है?”  श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक व्याख्या कर रहे हैं।

सूत्रं १६५

आभरणम्‌ अनभिमतमाय्‌ अऴुक्कु अभिमतमाय्‌ इरा निन्रधिरे|

सरल अनुवाद 

आभूषण अवांछनीय थे और मल/स्वेद वांछनीय था

व्याख्या

आभरणम्‌…

अर्थात्, इस संसार में सांसारिक सुखों में लिप्त लोगों के लिए वे आभूषण जो उनके प्रिय व्यक्ति के शरीर की चमक बढ़ाते हैं, अवांछनीय रहेंगे और वे मैल/स्वेद जो उनके प्रिय व्यक्ति के शरीर की चमक कम करते हैं, वांछनीय रहेंगे।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/19/srivachana-bhushanam-suthram-165-english/

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