श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७८

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श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक उदाहरण सहित समझाते हैं, “इतना ही नहीं, यदि कोई भगवान की अवहेलना करते हुए स्वयं ही भलाई की अन्वेषण करता है, तो यह केवल विनाश की ओर ले जाएगा।”

सूत्रं – १७८

अवनै ओऴियत्‌ तान्‌ तनक्कु नन्मै तेदुगैयावदु स्तनन्दय प्रजयै माता पिताक्कळ्‌ कैयिल्‌ निन्ऱुम्‌ वान्गि गातुकनान आट्टुवाणियन्‌ कैयिले काट्टिक्‌ कोदुक्कुमापोले इरुप्पदोन्ऱु |

सरल अनुवाद 

भगवान की अवहेलना करते हुए स्वयं के लिए भलाई की अन्वेषण करना एक दूध पीते बालक को उसके माता-पिता से छीनकर एक मांसविक्रेता के आधीन करने के समान है।

व्याख्या

अवनै …

अर्थात्, जीवात्मा के शुभचिंतक और योग्य भगवान के स्थान पर, जो जीवात्मा को सुख प्रदान करते हैं उनके विपरीत (अयोग्य और अशुभ) आत्मा द्वारा स्वार्थ की कामना करना, उस शिशु को, जो स्वयं की रक्षा के लिए आवश्यक ज्ञान आदि से रहित है और पूर्ण रूप से माता-पिता पर निर्भर है, उसके माता-पिता से छीनकर उसे एक ऐसे मांसविक्रेता को सौंप देने के समान है, जो बकरी का मांस बेचता है और मारने में संकोच नहीं करता, साथ ही शिशु को मारकर उसके मांस को भी उसमें मिला देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सर्वेश्वर आत्मा के रक्षक हैं और आत्मा ही स्वयं का संहारक है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/01/srivachana-bhushanam-suthram-178-english/

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