श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने अपने दिव्य हृदय में इन अहंकार आदि की क्रूर प्रकृति को समझाने का विचार करते हुए सर्वप्रथम अहंकार की क्रूर प्रकृति का वर्णन किया।

सूत्रं – १८१

अहंकारम्‌ अग्नि स्पर्शम्पोले 

सरल अनुवाद

अहंकार अग्नि के सम्पर्क में आने के समान है।

व्याख्या

अहंकारम्‌ …

अग्नि स्पर्शम्पोले

जिस प्रकार अग्नि के सम्पर्क में आने से सब कुछ जल जाता है उसी प्रकार यह अहंकार भी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नष्ट कर देगा क्योंकि यह आश्रयाशि (वह जो अपने ऊपर निवास करनेवाली वस्तु को नष्ट कर देता है) है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/04/srivachana-bhushanam-suthram-181-english/

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