श्रीवचन भूषण – सूत्रं २०७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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जब यह पूछा गया कि “क्या आप कह सकते हैं कि जन्म पर आधारित महानता का कोई मूल्य नहीं है? क्या सभी शास्त्र ब्राह्मणत्व का महिमामंडन नहीं करते?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने इसके पश्चात इस विषय को समझाया।

सूत्रं – २०७

ब्राह्मण्यम्‌ विलैच्‌ चॆल्लुगिऱदु, वेद अध्ययनादि मुकत्ताले भगवल्लाभ हेतु ऎन्ऱु; अदुदाने इऴवुक्कु उऱुप्पागिल्‌ त्याज्यमामिऱे।

सरल अनुवाद

ब्राह्मण्यम  (ब्राह्मण होने) का महत्त्व इसलिए है क्योंकि इसके माध्यम से वेदों का अध्ययन/अभ्यास किया जा सकता है और भगवान को पाया जा सकता है; अगर वही ब्राह्मण्यम विनाश का कारण बने, तो उसे छोड़ देना चाहिए।

व्याख्या

ब्राह्मण्यम् …

विलैच्‌ चॆल्लुगै

वांछनीय होना।

वेद अध्ययनादि मुकत्ताले भगवल्लाभ हेतु

जैसा कि “सर्वे वेदा यत्‌ पदमामनन्ति” (वह लक्ष्य/पद जिसे सभी वेद प्रतिपादित करते हैं) तथा श्रीभगवद्गीता १५.१५ में “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य:” (सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ) में कहा गया है, वेदों का तात्पर्य केवल भगवान ही हैं। वेद अपने पूर्वभाग में आराधना-स्वरूप (उपासना की विधि) तथा उत्तरभाग में आराध्य-स्वरूप (उपास्य तत्त्व) को प्रकाशित करते हैं; अतः सम्पूर्ण वेद-वाङ्मय पूर्णतः भगवान पर ही केन्द्रित है। ऐसा वेद व्यक्ति को भगवान की प्राप्ति में सहायक होता है, 

(अ) “स्वाध्यायोध्येतव्य:” के अनुसार अध्ययन—अर्थात् वेदों का अध्ययन, श्रवण एवं परम्परागत शिक्षण,

(आ) मीमांसा आदि शास्त्रों के माध्यम से उनके अर्थ का यथार्थ ज्ञान, तथा

(इ) उपासना अर्थात् भक्ति-योग आदि में प्रवृत्ति द्वारा।

अदुदाने इऴवुक्कु उऱुप्पागिल्‌ 

ब्राह्मणत्व के कारण कभी-कभी अहंकार उत्पन्न हो जाता है, जिससे भागवत-अपचार (भगवद्भक्तों का अपमान) की प्रवृत्ति जन्म लेती है। इस प्रकार का आचरण भगवान को अत्यन्त अप्रसन्न करता है और जीव भगवान से दूर हो जाता है। जैसा कि ब्रह्माण्डपुराण में कहा गया है, “अनाचारान् दुराचारान् अज्ञात्रून् हीन जन्मनः मद्भक्तान् श्रोत्रियो निन्दन् सद्यः चण्डालताम् व्रजेत् ||” अर्थात् जो व्यक्ति सभी प्रकार की योग्यता से सम्पन्न होकर भी मेरे भक्तों का निन्दा करता है, चाहे वह भक्त सदाचारी न हो, दुश्चरित्र हो, अज्ञानी हो अथवा हीन जन्म का हो—ऐसा व्यक्ति तत्क्षण चाण्डाल-समान स्थिति को प्राप्त कर लेता है।

त्याज्यमामिऱे।

श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने इस विषय के सुस्थापित स्वरूप को करुणापूर्वक स्पष्ट किया है। जो कारण भगवान की प्राप्ति का साधन है, उसे ही स्वीकार करना चाहिए; तथा जो कारण भगवान से वियोग का हेतु है, उसका त्याग करना चाहिए। क्योंकि यह निश्चित सिद्धान्त है कि ब्राह्मणत्वजन्य अहंकार भगवान से दूरी उत्पन्न करता है, अतः इस विषय में किसी प्रकार की त्रुटि या संशय की सम्भावना नहीं है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/31/srivachana-bhushanam-suthram-207-english/

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