कृष्ण लीलाएँ और उनका सार – २० – गोवर्धन लीला

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला << ऋषिपत्नियों द्वारा अनुग्रह प्राप्ति जब कृष्ण सप्त वर्ष हुए तब एक अतिमानवीय लीला की, जो बहुत ही अद्भुत थी। आइए उस आनन्दवर्धक लीला का अनुभव करें। एक दिन, वृन्दावन में वृद्ध ग्वालों ने एकत्र होकर एक उत्सव की चर्चा की। उसी … Read more

कृष्ण लीलाएँ और उनका सार – १९ – ऋषिपत्नियों द्वारा अनुग्रह प्राप्ति

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला << वस्त्र हरण एक बार कृष्ण बलराम और उनके ग्वाल-बाल सखा वृन्दावन में किसी वन में बैठे हुए थे। ग्वाल-बालों को भूख लगी तो उन्होंने कृष्ण और बलराम की ओर देख उनसे भोजन की व्यवस्था करने के लिए प्रार्थना की।उसी समय, कृष्ण … Read more

कृष्ण लीलाएँ और उनका सार – १८ – वस्त्र-हरण

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला <<बाँसुरी बजाना कृष्ण की मुख्य लीलाओं में गोपियों के वस्त्र हरण की लीला भी प्रमुख लीला है। आईए इस लीला को सार सहित जाने। कृष्ण को ग्वालिनों से बहुत प्रेम था, उसी प्रकार गोपिकाओं को भी कृष्ण से अतिप्रेम था। कृष्ण अधिकतर … Read more

कृष्ण लीलाएँ और उनका सार – १७ – बाँसुरी बजाना

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला << गायों और बछड़ों को चराना कृष्ण की मुख्य लीलाओं में से एक लीला बाँसुरी बजाना भी है। उनके कर कमलों में या कटिभाग में सदैव बांसुरी विद्यमान रहती है। जब भी कोई कृष्ण के बारे में सोचते हैं तो उन्हें बाँसुरी … Read more

कृष्ण लीलाएँ और उनका सार – १६ – गायों और बछड़ों को चराना

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला << प्रलम्बासुर वध  अपनी किशोरावस्था में, कृष्ण के मनलुभावन सेवाओं में से एक गौओं को चराना अतिप्रिय था। नम्माऴ्वार् (श्रीशठकोप) ने तिरुवाय्मोऴि में वर्णन किया है “तिवत्तिलुम् पसु निरै मेय्प्पुवत्ति” (कृष्ण को परमपदम् में रहने से भी अधिक प्रिय गौओं को चराना … Read more

कृष्ण लीलाएँ और उनका सार – १५ – प्रलम्बासुर वध

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रृंखला << कलिङ्ग नर्दनम् (कालियदमन) एक दिन कृष्ण और बलराम अपने ग्वाल-बाल सखाओं के साथ वृन्दावन में खेल रहे थे। एक प्रलम्बासुर नामक राक्षस ग्वाल-बाल का रूप धारण कर उनकी गोष्ठी में प्रवेश कर गया। वह किसी भी युक्ति को अपनाकर कृष्ण को … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य श्रीसूक्तियां – निष्कर्ष

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य की श्रीसूक्ति << पूर्व अनुच्छेद पहले के विषय में हमने नम्पिळ्ळै के ईडु महाव्याख्यानम् से उनके रहस्योद्धघाटन का आनंद लिया है। तिरुवाय्मोऴि के लिए नम्पिळ्ळै और उनके ईडु व्याख्यानम् की महिमा अच्छी तरह से प्रस्तुत की है। नम्पिळ्ळै नञ्जीयर् के दिव्य करुणा … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य श्रीसूक्तियाँ – १९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम:। श्रीमते रामानुजाय नम:। श्रीमद् वरवरमुनये नमः। श्रीवानाचलमहामुनये नमः। लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियाँ << पूर्व अनुच्छेद १८१–रक्ष्य वर्गम् कुऱैवट्र देसमागैयाले रक्षकनुक्कु सम्पत्तु मिक्किरुक्कुम् इङ्गु। कैङ्कर्यत्तुक्कु विच्छेदमिल्लामैयाले सेष भूतनुक्कु सम्पत्तु मिक्किरुक्कुम् अङ्गु। भगवान इस संसार (भौतिक संसार) में जीवात्मा के उत्थान करके अपनी “रक्षकन” (रक्षक/उज्जीवित कर्ता) उपाधि स्थापित करने की खोज में हैं। जबकि असंख्य जीवात्माएँ … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य श्रीसूक्तियाँ – १८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नम:। श्रीमते रामानुजाय नम:। श्रीमद् वरवरमुनये नमः। श्रीवानाचलमहामुनये नमः। लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियाँ << पूर्व अनुच्छेद १७१– निरपेक्षनान तान् कुऱैय निन्ऱु इवनुडैय कुऱैयैत् तीर्क्कुमाय्त्तु, तान् सापेक्षनाय् निन्ऱु इवनै निरपेक्षनाक्कुम्। सापेक्षन् – इच्छा सहित/आशापूर्ण निरपेक्षन् -इच्छा रहित/आशा विहीन  अपनी अहैतुक/निर्हेतुक कृपा से, जीवात्माओं को पार लगाने के लिए, वे (भगवान) अवतरित होकर जीवत्माओं की … Read more

४००० दिव्यप्रबंधम्

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीमन्नारायण ने कुछ चुनिंदे आत्माओं को दैविक ज्ञान और उसके प्रति असीम भक्ति प्रदान कर अनुग्रहित किया, और उन्हें आऴ्वार बनाया। इन आऴ्वारों ने श्रीमन्नारायण की स्तुति में क‌ई दिव्य स्तोत्रों (जिसे तमिऴ् में पासुरम् कहते हैं) की रचना की‌। ये पासुरम् कुल मिलाकर लगभग ४००० … Read more