श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६५
श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया, “क्या दोष (भौतिक शरीर) को दूर करने पर आत्मा का सच्चा स्वरूप अत्यंत शुद्ध और आनंददायक नहीं होगा? ऐसे में शरीर का निष्कासन अवांछनीय क्यों है और शरीर स्वयं वांछनीय क्यों है?” श्री पिळ्ळै लोकाचार्य … Read more