श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका पूर्व [सूत्र १५६] में “ससाक्षिकम्‌ आगैयाले इप्पन्धत्तै इरुवरालुम्‌ इल्लै सॆय्यप् पोगादु” कहा गया था जो कि चेतन और ईश्वर दोनों का, साक्षी पुरुषकार [पिरट्टी] के प्रति नित्य पारतंत्र्यम् (शाश्वत, संपूर्ण निर्भरता) पर आधारित है; इसलिए, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके अतिरिक्त, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यह सिद्धांत वेद के अनुकूल है”। सूत्रं – १४९ इव्वर्त्तत्तै वेद पुरुषन्‌ अपेक्षित्तान्‌। सरल अनुवाद वेदपुरुष (वेदों का साक्षात रूप) इस [पिछले सूत्र में समझाया गया] सिद्धांत से सहमत हैं । … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके पश्चात, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी इस  [जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के सम्बन्ध को न छोड़ने का सिद्धांत, जो अम्माजी की गवाही में स्थापित किया गया था] सिद्धांत का प्रमाण दे रहे हैं । सूत्रं – १५७  “ऎन्नै … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका वह चेतन जिसने सदा भगवान से मुँह मोड़ लिया था, आज ही भगवान की ओर मुख (ईश्वर अभिमुख होना) किया है; क्या होगा यदि वह चेतन, भौतिक शरीर धारण करके इस संसार में लिप्त होने के कारण, बुरे … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इतना ही नहीं, इसका एक और लाभ भी है। (पुरुषकार) सूत्रं – १५५ अनित्यमान इरुवर्‌ पारतन्त्र्यमुम्‌ कुलैवदुम्‌ अत्ताले. सरल अनुवाद ऐसे पुरुषकार द्वारा दोनों की अस्थायी पारतन्त्र्यम् (अवलंबित होना) भी नष्ट हो जाएगी। व्याख्या अनित्यमान … अनित्यमान पारतन्त्र्यमुम्‌ … Read more

श्री रामायण तनि श्लोकम् – ५ – बाल काण्ड १९.१४ – अहं वेद्मि – भाग ४

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः पूरी श्रृंखला << भाग ४ अहं वेद्मि, (बाल काण्ड १९.१४); भाग ४ अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ।। १.१९.१४ ।। यह श्लोक विश्वामित्र महर्षि ने राजा दशरथ से कहा है। सरल अर्थ – मैं श्री राम को जानता हूँ … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी बताते हैं कि उन्होंने पहिले किस बात को “स्वरूप” के रूप में सुनिश्चित  किया था। सूत्रं – १५४ औपाधिकमुमाय्‌ नित्यमुमान पारतन्त्र्यम्‌ इरुवर्क्कुम्‌ उण्डिऱॆ। सरल अनुवाद दोनों की [श्रीजी के प्रति] आकस्मिक और स्वाभाविक निर्भरता है। … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इतना ही नहीं, मध्यस्थता का एक अन्य उद्देश्य भी है। सूत्रं – १५३ स्वरूप सिद्धियुम्‌ अत्ताले। सरल अनुवाद  इससे व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का भी ज्ञान होता है। व्याख्या स्वरूप … स्वरूप – चेतन के लिए यह … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “यद्यपि चेतन स्वाभाविक रूप से दास है और भगवान स्वाभाविक रूप से स्वामी हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे के पास सीधे पहुँच सकते हैं। किन्तु वे एक-दूसरे के निकट मध्यस्थों के माध्यम से क्यों … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “भगवान ने स्वतंत्र होते हुए भी इन विभूतियों (श्रीहनुमानजी और श्रीनिषादराज) को श्रीलक्ष्मणजी और माता सीता के माध्यम (मध्यस्थ/पुरुषकार) से उनसे सम्पर्क कर स्वीकार किया जैसा कि श्रीरामायण के किष्किन्धा काण्ड ३.२७ में … Read more