श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके पश्चात, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं कि भगवान को अपने प्रिय भक्त का शरीर कितना प्रिय होता है। सूत्रं – १७० “तिरुमालिरुञ्जोलै मलैये” ऎन्गिरपडिये उगन्दरुळिन निलङ्गळ् ऎल्लावट्रिलुम् पण्णुम् विरुप्पत्तै इवनुडैय शरीरैकदेशत्तिले पण्णुम् सरल अनुवाद जैसा … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी एक अन्य मार्ग से अपने भक्त के दिव्य शरीर के प्रति भगवान के प्रेम को उजागर करते हैं। सूत्रं – १६९ परमार्तनान इवनुडैय शरीर स्थितिक्कु हेतु, केवल भगवदिच्छैयिऱे। सरल अनुवाद भौतिक संसार में रहने के … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक एक उदाहरण देकर समझाते हैं कि भगवान को आऴ्वार् के दिव्य शरीर से न केवल उस प्रकार लगाव है जैसे किसी व्यक्ति को अपने प्रियतम के मैल से होता है, परंतु साथ ही उसमें … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया, “इस प्रकार, जैसे कोई अपने प्रिय व्यक्ति के मैला/श्वेत को चाहता है, उसी प्रकार ईश्वर उस शरीर से प्रीति रखते हैं जिसे आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति त्याग देता है, जैसा कि तिरुविरुत्तम् १ में कहा गया … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी हमें भगवान के शब्दों का स्मरण दिलाते हुए इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि यह केवल सांसारिक उदाहरण में ही नहीं, परंतु पिराट्टी के प्रति भगवान के दृष्टिकोण में भी देखा जाता है। सूत्रं … Read more

आचार्य हृदयम् – ३४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – ३३ अवतारिका (परिचय) इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ जन्म प्राप्त करने के विषय का स्पष्टीकरण किया जाता है। चूर्णिका ३४ अन्दणर् मऱैयोर् ऎन्ऱुम् अडियार् तॊण्डरॆन्ऱुम् इवर्गळुक्कु निरूपकम्। सरल व्याख्या – कर्मनिष्ठ जनों का परिचय अन्दणर् और मऱैयोर् के रूप … Read more

आचार्य हृदयम् – ३३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – ३२ अवतारिका (परिचय) इस चूर्णिका से पहले की चूर्णिकाओं में,  नायनार् ने ३१वीं चूर्णिका में कर्म और कैङ्कर्य के अधिकार (योग्यता) में अंतर बताया; ३२वीं चूर्णिका में उन्होंने इस सम्बन्ध को विच्छेद करने के लिए बड़ा अन्तर … Read more

आचार्य हृदयम् – ३२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – ३१ अवतारिका (परिचय) यहाँ इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया गया है कि कर्मनिष्ठ (कर्म करने में एकाग्र) और कैङ्कर्यनिष्ठ (कैङ्कर्य करने में एकाग्र) के मध्य एकता नहीं है। चूर्णिका -३२ साधन साध्यङ्गळिल् मुदलुम् मुडिवुम् वर्णधर्मिगळ् दासवृत्तिगळ् … Read more

श्री रामायण तनि श्लोकम् – ६ – बाल काण्ड २०.२ – ऊनषोडशवर्ष: – भाग १

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः पूरी श्रृंखला << भाग ५ ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।। श्री कृष्णपाद आचार्य (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै) ने, जो शरणागति-शास्त्र माना जाता है अर्थात श्रीरामायणम् के अनेक महत्त्वपूर्ण श्लोकों पर अत्यन्त गम्भीर और विस्तृत व्याख्यान लिखा है। इस श्रृंखला में अब तक बालकाण्ड के १९.१४वें … Read more

श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के दिव्य नाम – शठकोप, तोण्डर् पिरान्

श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः। पूरी श्रृंखला << नम्माऴ्वार् १. श्री शठकोप दिव्य नाम की महिमा “शठकोप” नम्माऴ्वार् का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं परम पावन संस्कृत नाम है। स्वयं आऴ्वार् ने भी अपने दिव्यप्रबन्धों में अनेक स्थानों पर इस नाम का उल्लेख किया है। श्रीसम्प्रदाय में इस नाम का इतना माहात्म्य है … Read more