श्रीवचन भूषण – सूत्रं १२४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “लेकिन हम भक्ति योग करके मोक्ष क्यों नहीं प्राप्त कर सकते, जैसे अनमोल रत्न और राज्य पाने के लिए अतुलनीय समुद्री शंख और नींबू अर्पित किए जाते हैं?” श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “आत्मा … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १२३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कह रहे हैं “इसके अतिरिक्त, अन्य उपायों (विशेष रूप से भक्ति योग) के लिए एक और दोष है जिसका नाम है फल विसदृशत्वम् (साधन परम पुरुषार्थ के लिए उपयुक्त नहीं है)”। सूत्रं – १२३ रत्नत्तुक्कु … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १२२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी एक आदरणीय पुरुष के शब्दों के माध्यम से उपायान्तरों (अन्य साधनों) की सबसे निषिद्ध प्रकृति को समझाते हैं जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप के लिए विनाशकारी हैं। सूत्रं – १२२ तिरुक्कुरुगैप्पिरान् पिळ्ळान् पणिक्कुम्बडि – मदिराबिन्दु मिश्रमान … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १२१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी उस विरोधाभास को दर्शा रहे हैं जो तब उत्पन्न होगा जब पूर्व में बताए गए सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सूत्रं – १२१ इप्पडिक् कॊळ्ळादप्पोदु एतत् प्रवृत्तियिल् प्रायश्चित्त विधि कूडादु।  सरल अनुवाद  जब इस प्रकार … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १२०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक अन्य उपायों से उत्पन्न होने वाले दोषों को समझाते हैं, जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर देते हैं। सूत्रं – १२० “वर्धते मे महत् भयम्” ऎन्गैयाले भयम् जनकम्; “मा शुचः” ऎन्गैयाले शोक जनकम्। … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ११९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ज्ञानियों में अग्रणी श्रीशठकोप स्वामीजी (नम्माऴ्वार्) के शब्दों के माध्यम से उस विपत्तिपूर्ण प्रकृति को दर्शाते हैं। सूत्रं – ११९ “नॆऱिकाट्टि नीक्कुदियो” ऎन्ना निन्ऱदिऱे। सरल अनुवाद श्रीशठकोप स्वामीजी ने पेरिय तिरुवन्ददि ६ में कहा “नॆऱि काट्टि … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ११८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका ये ज्ञानियों के लिए कैसे विनाशकारी हैं? सूत्रं – ११८ अपायमाय्त्तदु स्वरूप नाशकम् आगैयाले। सरल अनुवाद ये विनाशकारी इसलिए हैं क्योंकि ये आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर देते हैं। व्याख्या अपायमाय्त्तदु स्वरूप नाशकम् आगैयाले। स्वरूप – पूर्ण … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ११७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका परन्तु, ज्ञानियों के लिए ये उपाय क्या हैं? सूत्रं – ११७ ज्ञानिगळुक्कु अपायम्। सरल अनुवाद  ज्ञानी व्यक्तियों के लिए ये विपत्तिपूर्ण हैं। व्याख्या ज्ञानिगळुक्कु अपायम् अर्थात्, जिन लोगों को आत्मा के वास्तविक स्वरूप का गहन बोध (स्वरूप याथात्म्य ज्ञान) … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ११६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “क्या हम अन्य उपायों को बाधा के रूप में त्याग सकते हैं? क्या उन्हें भी मोक्ष के साधन के रूप में नहीं समझाया गया है? यदि हम उन्हें त्याग रहे हैं, तो वे किसके लिए … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ११५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इससे पहले श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति को पूरी तरह से त्यागने और भगवद् विषय को स्वीकार करने के मुख्य कारणों को समझाया था; इस संदर्भ में, तत्पश्चात, वे अन्य साधनों को पूर्णतया त्यागने … Read more