लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य श्रीसूक्तियाँ – १७

 श्री: श्रीमते शठकोपाय नम:। श्रीमते रामानुजाय नम:। श्रीमद् वरवरमुनये नमः। श्रीवानाचलमहामुनये नमः। लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियाँ << पूर्व अनुच्छेद १६१– प्रणवार्थमुम् नमच्छब्दार्थमुम् व्यापकत्वमुम् अव्यापक्त्वमुम् अल्लाद व्यापक मन्दिरङ्गळिलुम् उण्डु। “ओ३म (ॐ)” का अर्थ है जीवात्मा भगवान का दास है। “नमः” का अर्थ है “मैं स्वयं का दास नहीं हूँ”। इनका और भगवान की सर्वव्यापकता का अन्य व्यापक … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य श्रीसूक्तियां – १६

 श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियाँ << पूर्व अनुच्छेद १५१ – शेषिक्कु अतिसयत्तै विळैक्कैये शेषवस्तुवुक्कु स्वरूपम्। शेषी-स्वामी/आदि, शेष वस्तु – दास/द्वितीय। एम्पेरुमान् सर्वोच्च स्वामी परमपिता परमात्मा हैं और जीवात्मा नित्य दास है। जीवात्मा की स्वाभाविक क्रिया भगवान की स्तुति करना है अनुवादक टिप्पणी – एम्पेरुमानार् … Read more

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियाँ – १५

 श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियाँ << पूर्व अनुच्छेद १४१-तामस पुरुषर्गळोट्टै सहवासम् सर्वेश्वरनुक्कु त्याग हेतु। सत्वनिष्टरोट्टै सहवासम् ईश्वरनुक्कु स्वीकार हेतु। तामसिक (अज्ञानी) जनों का संग करने के कारण एम्पेरुमान् (श्रीमन्नारायण) ही हमें भटका देते हैं। और सात्विक (ज्ञानवान श्रीवैष्णव) जनों का संग करने से एम्पेरुमान् … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं ८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला पूर्व​ अवतारिका श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​ स्वामीजी अम्माजी के विषय में तीन गुण कृपा, पारतंत्रय और अनन्यार्हतव को तीन वाक्य में समझाते हैं।  सूत्रं ८ पिराट्टि मुऱ्पडप् पिरिन्ददु तन्नुडैय कृपैयै वॆळियिडुगैक्काग, नडुविल् पिरिन्ददु पारतन्त्र्यत्तै वॆळियिडुगैक्काग, अनन्तरम् पिरिन्ददु अनन्यार्हत्वत्तै वॆळियिडुगैक्काग सरल अनुवाद सबसे पहिले … Read more

   लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य श्री सूक्तियां – १४

   श्री: श्रीमते शठकोपाय नम: श्रीमते रामानुजाय नम: श्रीमते वरवरमुनये नमः लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां << पूर्व अनुच्छेद १३१-इवर्गळैत् तनित्तनिये पट्रिनार्क्कु स्वरूप विनाशमिऱे मिदुनमे उपदेश्यमेन्ऱिरुप्पार्क्कु स्वरूप उज्जीवनमिऱे। जो व्यक्ति पिराट्टि (श्री महालक्ष्मी जी) और पेरुमाळ् (श्रीमन्नारायण) को पृथक-पृथक जानता है उसके प्राकृतिक स्वरूप (श्रीमन्नारायण के दास के रूप में पहचान) का विनाश हो जाएगा। जो व्यक्ति दिव्य … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला पूर्व​ अवतारिका तत्पश्चात पुरुषकार कि प्रकृति को समझाने के लिये पहिले श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक उन गुणों कि व्याख्या करते हैं जो पुरुषकारत्व के लिये आवश्यक हैं।  सूत्रं ७ पुरुषकारमाम्पोदु कृपैयुम् पारतन्त्रयमुम् अनन्यार्हत्वमुम् वेणुम्  सरल अनुवाद पुरुषकार करते समय कृपा, … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला पूर्व​ अवतारिका श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​ स्वामीजी ने उज्जीवन के लिए आवश्यक पहलुओं को उजागर करने के लिए उपब्रुह्मणों के माध्यम से वेदांत का सार निर्धारित करना प्रारम्भ किया। इसमें, बाद में, वह दयापूर्वक इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि “वर्तमान … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला पूर्व​ अवतारिका सबसे पहिले सूत्र १ में “वेदार्थम …” के साथ श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​ स्वामीजी वेद उसके अर्थ और उपब्रुह्मणम् को एक साथ समझाया हैं। जैसे कि उन्होंने उस वेद के पूर्व और उत्तर भाग के वर्गिकरण पर प्रकाश डाला और जैसे … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ४ 

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला पूर्व अवतारिका  श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​ स्वामीजी इतिहास कि श्रेष्ठता को ओर स्थापित करते हैं   सूत्रं ४ अत्ताले अदु मुऱपट्टदु। सरल अनुवाद  उस कारण से उसे पहिले कहा गया हैं  व्याख्यान  अत्ताले …  इतिहास के उस अधीक प्रामाणिकता के कारण जैसे कि छांदोग्य … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं ३ 

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला पूर्व अवतारिका  श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​  स्वामीजी इस संदेह को स्पष्ट करने हेतु व्याख्या कर रहे हैं “यदि उत्तरभाग उपबृंहण (इतिहास और पुराण जो वेदान्त को समझाते हैं) में कोई श्रेणी हैं” वैकल्पिक व्याख्या – श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​ स्वामीजी स्वयं स्वेच्छा से बताते हैं कि … Read more