श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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अवतारिका

जब उनसे पूछा गया कि “भगवान ने स्वतंत्र होते हुए भी इन विभूतियों (श्रीहनुमानजी और श्रीनिषादराज) को श्रीलक्ष्मणजी और माता सीता के माध्यम (मध्यस्थ/पुरुषकार) से उनसे सम्पर्क कर स्वीकार किया जैसा कि श्रीरामायण के किष्किन्धा काण्ड ३.२७ में कहा गया है तमभ्य भाष सौमित्रे सुग्रीव सचिवं कपिम्‌ (हे लक्ष्मण! आप हनुमान से बात करें जो सुग्रीव के मंत्री हैं और जो अच्छे से बोल सकते हैं) और पेरिय तिरुमोऴि ५.८.१ ‘माऴै मान् मड नोक्कि उम्बि ऎम्बि ’ (यह सीता जिनके पास युवा हिरण की आँखें हैं, वह आपकी सहेली हैं और आपके भाई लक्ष्मण मेरे भाई हैं); क्या ऐसी अन्य परिस्थितियाँ (दृष्टांत) हैं जहाँ उन्होंने पुरुषकार (मध्यस्थ – जो जीवात्मा और भगवान को एक करते हैं) के माध्यम से चेतनाओं को स्वीकार किया?”  श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक समझाते हैं।

सूत्रं– १५१

इवन्‌ मुन्निडुमवर्गळै अवन्‌ मुन्निडुम्‌ ऎन्नुमिडम्‌ अभय प्रदानत्तिलुम् काणलाम्‌।

सरल अनुवाद

यह दृष्टांत वहाँ भी देखा जा सकता है जहाँ श्रीराम ने श्रीविभीषणजी को शरण दी थी, कि वे उन मध्यस्थों के माध्यम से चेतनाओं के पास पहुँचते हैं, जिनके माध्यम से चेतनाएँ भगवान के पास पहुँचते हैं।

व्याख्या

इवन्‌

अर्थात् – जो भगवान के शरणागत होते हुए चेतन द्वारा पुरुषकार माने जाते हैं, वे ही भगवान द्वारा चेतनों को स्वीकार करते हुए भी मध्यस्थ माने जाना – यह परिस्थिति न केवल हनुमानजी और श्रीनिषादराज  को स्वीकार करते हुए देखा जा सकता है, परंतु वहाँ भी देखा जा सकता है जहाँ उन्होंने श्रीविभीषणजी को स्वीकार किया था।

ऐसा कैसे ?

श्रीविभीषणजी ने श्रीरामायण के युद्ध काण्ड १७.१६ के अनुसार यह कहते हुए समर्पण किया “सोहम्‌ परुषितस्थेन दासवच्छावमानितः । त्यक्त्वा पुत्राम्श्च धाराम्श्च राघवं शरणमं गतः ॥”  (मैं, जिसने रावण को अच्छी सलाह दी थी, मुझे ऐसे रावण द्वारा कठोर शब्दों से अपमानित किया गया और एक सेवक की भाँति अपमानित किया गया, मैं अपनी पत्नी और पुत्रों को त्यागकर श्रीराम के शरण में आ गया) और श्रीरामायण युद्ध काण्ड १७.१३ के अनुसार ही रहा “सर्वलोक शरण्याय राघवाय महात्मने । निवेदयत मां क्षिप्रं विभीशणम्‌ उपस्थितम्‌ ॥” (हे वानरों! कृपया शीघ्र जाकर मेरे विषय में बताओ, जिसका नाम विभीषण है और जो सभी के शरणस्थल महापुरुष राघव की शरण में आने के लिए यहाँ आया है)। अभय प्रदानम् (शरण प्रदान करना) से श्रीविभीषण को स्वीकार करते हुए उन्होंने सुग्रीव महाराज के माध्यम से श्रीविभीषण को स्वीकार किया जो सभी भक्तों के राजा हैं, जैसा कि श्रीरामायण युद्धकाण्ड १८.३४ में कहा गया है आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया । विभीषणॊ वा सुग्रीव यदि वा रावणस्स्वयम्‌ II” (हे वानर श्रेष्ठ सुग्रीव! मैं विभीषण (जिसने अपने संबंधियों को त्याग दिया) को संरक्षण देता हूँ; चाहे वह विभीषण हो या रावण उसे मेरे सामने लाओ)।

श्रीराम जब हनुमानजी और श्रीविभीषणजी को स्वीकार कर रहे थे तब श्रीजी (महालक्ष्मी / पिराट्टि) की भौतिक उपस्थिति दिखाई नहीं देती हैं  इसलिए श्रीजी के द्वारा उन्हें स्वीकार करना प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता। परन्तु चूँकि श्रीजी कृपापूर्वक लंका जाते समय, श्रीजी ने दिव्य आभूषण यहाँ फेंके और उन पर कृपापूर्वक दृष्टि डालीं और जब श्रीजी कृपापूर्वक लंका पहुँचीं तो उन्होंने श्रीविभीषणजी को भगवान के दिव्य चरणों में समर्पण करने के लिए कृपापूर्वक दृष्टि डालीं, हमें यह मानना ​​चाहिए कि भगवान ने उन्हें केवल उनके माध्यम से ही स्वीकार किया। चूँकि माता महालक्ष्मी परतंत्रा (पूर्णतः आश्रित) हैं, इसलिए वे उनके विचारों से अलग कुछ नहीं करेंगी; इसीलिए, परगत स्वीकार की व्याख्या करते समय, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी भी [श्रीजी की कृपापूर्ण दृष्टि से] भगवान द्वारा श्रीविभीषण को स्वीकार करने का उल्लेख कर रहे हैं ।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/05/srivachana-bhushanam-suthram-151-english/

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