श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

पूरी श्रृंखला

<< पूर्व

अवतारिका

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक इन (भक्तों और दिव्य निवास) को लक्ष्य और साधन मानते हुए अपने आसक्ति के स्तर को समझाते हैं।

सूत्रं – १७२

“कल्लुम्‌ कनै कडलुम्‌” ऎन्गिऱपडिये इदु सिद्दित्ताल्‌ अवट्रिल्‌ आदरम्‌ मट्टमाय्‌ इरुक्कुम्‌”

सरल अनुवाद

जैसा कि पॆरिय तिरुवंदादि ६८ “कल्लुम्‌ कनै कडलुम्‌” (तिरुमला, एक  पर्वत, क्षीराब्धि, एक गूँजता हुआ सागर) में कहा गया है, जब एक भक्त प्राप्त हो जाता है, तो दिव्य निवास के प्रति उनका [भगवान का] लगाव कम हो जाएगा।

व्याख्या

कल्लुम्‌

अर्थात, आऴ्वार् ने कहा, “जब भगवान मेरे हृदय में प्रवेश कर गए, यह दर्शाते हुए कि उन्हें किसी और वस्तु में कोई रुचि नहीं है, क्योंकि वे मेरे हृदय में अत्यंत आसक्ती के साथ शाश्वत रूप से निवास करते हैं, तो क्या तिरुमला, क्षीराब्धि (जो उनकी उपस्थिति से कोलाहल मचा रहा है) और परमपद/बैकुंठ (जो किसी के लिए भी अप्राप्य है) जैसे दिव्य धामों का आकर्षण उनके लिए अल्प हो गया है?” उसी प्रकार, जब भक्त का हृदय अर्थात् लक्ष्य प्राप्त हो जाता है, तो उन दिव्य धामों के प्रति आसक्ति कम हो जाती है, जिन्हें उसने लक्ष्य प्राप्ति के साधन के रूप में चाहा था। साधन के प्रति आसक्ति केवल लक्ष्य की प्राप्ति तक ही बनी रहती है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/26/srivachana-bhushanam-suthram-172-english/

संगृहीत- https://granthams.koyil.org/

प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Leave a Comment