श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी इसे विस्तार से बता रहे हैं।
सूत्रं – २१२
उत्कृष्टमाग भ्रमित्त जन्मम् भ्रम्श सम्भावनैयाले “शरीरे च” ऎन्गिऱपडिये भय जनकम् |
सरल अनुवाद
जिस जन्म को श्रेष्ठ समझा गया था वही अब डर का कारण बनेगा क्योंकि इसमें नीचे गिरने की सम्भावना है जैसा कि ‘जितन्ते स्तोत्र’ के ९वें श्लोक “शरीरे च” (अपने शरीर को भी देखकर) में कहा गया है।
व्याख्या
उत्कृष्टमाग …
यह प्रश्न निचले जन्म को गलती से ऊँचा माननेवाले दृष्टिकोण से किया गया है – क्योंकि ऐसे निम्न जन्म में उस घमंड का विनाश होता है जो उच्च कुल के परिवार में जन्म लेने के कारण उत्पन्न हो सकता है – यह “अतस्मिंस्तद्बुद्धि” (जो वस्तु श्रेष्ठ नहीं है उसे श्रेष्ठ समझ लेने का भ्रम) के कारण होता है।
भ्रम्श सम्भावनै
दूसरे उपायों में लगने के कारण ‘अनन्य-उपायत्व’ (किसी अन्य उपाय का न होना) के स्वभाव से विचलित होने की संभावना रहती है।
‘शरीरे च’ ऎन्गिऱपडिये भय जनकम्
‘जितन्ते स्तोत्रम्’ के श्लोक ९ “कालेष्वपि च सर्वेषु” (जब मैं सभी ऋतुओं को देखता हूँ) श्लोक से प्रारम्भ होकर, दूसरे उपायों को अपनाने की संभावना के कारण उत्पन्न होने वाले भय का कारण बताते हुए इस बात का विशेष रूप से प्रतिपादन किया गया है कि भय उत्पन्न करने वाली बातों में सबसे प्रमुख बात वह है जो “शरीरे च वर्तते मे महत् भयम्” (मेरे शरीर को देखकर मुझे बहुत भय होता है [जो दूसरे उपायों को अपनाने के योग्य है]) में कही गई है। जो लोग आत्मा के यथार्थ स्वरूप को जानते हैं और जो किसी दूसरे उपाय को अपनाना सहन नहीं कर सकते, उनके लिए यह शरीर [जो दूसरे उपायों को अपनाने के योग्य है] भय का कारण बनता है, क्योंकि जब तक यह शरीर विद्यमान रहेगा तब तक दूसरे उपायों को अपनाने का लोभ बना रहेगा।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/09/05/srivachana-bhushanam-suthram-212-english/
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