श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः।
९. वकुलाभरण
वकुलाभरण श्री शठकोप सूरी का संस्कृत दिव्यनाम है। वकुल (बकुल/मगिऴम्) एक अत्यंत सुगंधित पुष्प है, जिसे तमिऴ् भाषा में “मगिऴम् पू” कहा जाता है।
श्री शठकोप सूरी सदैव इस दिव्य वकुल-पुष्पमाला से विभूषित रहते हैं, यही कारण है कि उन्हें “वकुलाभरण” कहा जाता है, अर्थात् जो वकुल-माला को अपने दिव्य आभूषण के रूप में धारण करते हैं। वास्तव में वह वकुलमाला स्वयं आऴ्वार् का एक अद्वितीय अलंकार बन गई है।
श्री शठकोप सूरी की स्तुति करते हुए कहा गया है – “वकुलाभरणं वन्दे जगदाभरणं मुनिम्।” अर्थात् – मैं उन महर्षि श्री शठकोप सूरी को प्रणाम करता हूँ, जो वकुल-पुष्पमाला से विभूषित हैं तथा स्वयं सम्पूर्ण जगत् के लिए आभूषण (शोभा) स्वरूप हैं।
जिस प्रकार भगवान् श्रीमन्नारायण की दिव्य पहचान उनकी तुलसीमाला तथा वनमाला है, उसी प्रकार श्री शठकोप सूरी की विशिष्ट पहचान उनकी वकुलमाला है। तिरुवाय्मोऴि के ४.१० “ऒन्ऱुम् तेवुम्” दशक के अन्तिम पासुरम् में स्वयं आऴ्वार् अपनी इस दिव्य पहचान का उल्लेख करते हैं – “आट्चॆय्दु आऴिप्पिरानैच् सेर्न्दवन् वण् कुरुगूर् नगरान्। नाट्कमऴ् मगिऴ् मालै मार्बिनन् माऱन् सटकोपन् ॥” यहाँ “मगिऴ् मालै” अर्थात् वकुलमाला है। “मगिऴ् मालै मार्बिनन्” का अभिप्राय है, जिनके अलौकिक वक्षःस्थल की शोभा सदैव वकुल-पुष्पमाला से बढ़ती (उद्भासित होती) रहती है। इसी कारण वे वकुलाभरण नाम से विख्यात हैं।
१०. वकुलभूषण भास्कर
भास्कर का अर्थ है—सूर्य।
जैसे सूर्य उदित होकर बाह्य अन्धकार का विनाश करता है, उसी प्रकार श्री शठकोप सूरी जीवों के हृदय में व्याप्त आन्तरिक अन्धकार – अज्ञान का पूर्णतः विनाश कर देते हैं।
आऴ्वार् वकुलमाला से अलंकृत हैं।
वकुल — वकुल (मगिऴम्) पुष्पमाला।
भूषण — दिव्य आभूषण।
यहाँ भूषण और आभरण दोनों का अर्थ अलंकार ही है।
अतः यह नाम बताता है कि श्री शठकोप सूरी जीवों के अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करते हैं, और वे वकुलमाला से सुशोभित हैं।
अडियेन् श्यामसुंदर रामानुज दास
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