श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:
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अवतारिका
सूत्र ५७, ५८ और ५९ के लिए सामान्य परिचय। प्रपत्ती के अनुपायत्वम (साधन नहीं) को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी सिद्धोपाय (भगवान, आसानी से उपलब्ध साधन) और साध्योपाय (अन्य उपाय, जो व्यक्तिगत प्रयासों से स्थापित किए जाने हैं) की प्रकृति की व्याख्या करते हैं और प्रपत्ती और उन दो प्रकारों के उपाय के अंतर पर प्रकाश डालते हैं।
सूत्रं – ५७
उपायम् तन्नैप् पॊऱुक्कुम्।
सरल अनुवाद
भगवान, [वास्तविक] उपाय होते हुए स्वयं को (उपाय के रूप में) सहन करेंगे।
व्याख्या
उपायम् … पॊऱादु (५९वां सूत्रं तक)
उपायम् तन्नैप् पॊऱुक्कुम्
यदि सर्वेश्वर जो सिद्धोपाय हैं, जो इच्छाओं के स्वतंत्र दाता और बाधाओं को दूर करने वाले हैं को उपाय के रूप में वर्णित किया गया है तो वह उस भूमिका में योग्य होंगे। जिस प्रकार भगवान के लिए उपेय स्वरूप (प्राकृतिक पहलू) है, उसी प्रकार उपाय भी स्वरूप है जैसा कि श्रीरंगराज स्तवम् उत्तर शठकम ८७ में कहा गया है “उपायोपेयत्वे तदिहतव तत्वं न तु गुणौ” (इसलिए उपाय और उपेय होना स्वाभाविक है और अर्जित गुण नहीं)। महाभारत अरण्य पर्व ८६.२६ में कहा गया है “येच वेदविदोविप्रः येचाद्यात्मविदो जनाः। ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम्।।” (वेदों को जाननेवाले और वेदांत में पारंगत विद्वान कहते हैं कि कृष्ण धर्म का सबसे प्राचीन रूप है), “शरण्यं शरणं च त्वाम् आहूर् दिया महर्षयः” (दिव्य ज्ञान वाले महान ऋषि आपको लक्ष्य और साधन के रूप में कह रहे हैं) और लक्ष्मी तन्त्रम् में “अमृतं साधनं साध्यं सम्पश्यन्ति मनीषिणः” (वे महान मन पर नियंत्रण रखनेवाले जन आपको शाश्वत साधन और लक्ष्य के रूप में देख रहे हैं)।
जैसा कि श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी केवल “तन्नैप् पॊऱुक्कुम्” (स्वयं सहन करेंगे) कह रहे हैं, इसका तात्पर्य यह है कि अन्य उपाय सहन नहीं किए जाते हैं। ये सिद्धोपाय (भगवान्) किसी भी प्रकार से कोई सहायता प्राप्त करना बर्दाश्त नहीं कर सकते।
श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने स्वयं परन्दपडि में इस सिद्धांत को समझाते हुए कहा हैं “क्योंकि यह विशेष साधन (भगवान) स्वयं के अलावा कुछ भी सहन नहीं करेंगे, अनुकुल्य संकल्प (अनुकूल होने का संकल्प) आदि को धान की पिटाई के समय निकलने वाले श्वेत की तरह एक प्राकृतिक परिणाम माना जाता है, न कि अंगों के रूप में माना जाता है” [जब उन्हें अंगों के रूप में कहा जाता है तो इसका अर्थ है कि भगवान उन पर निर्भर हैं जो उनके स्वभाव से मेल नहीं खाता है]
[आनुकूल्य सङ्कल्पम् से प्रारम्भ होनेवाले छह पहलू –> आनुकूल्य सङ्कल्पम् (अनुकूल होने का संकल्प), प्रातिकूल्य वर्जनम् (प्रतिकूल कार्यों को त्यागना), रक्षियतीति विश्वासम् (रक्षक के रूप में भगवान पर दृढ़ विश्वास रखना), गोप्तृत्व वरणम् (भगवान को साधन के रूप में स्वीकार करना), कार्पण्य्म् (असहाय होना), आत्म निष्कर्षम (स्वयं को अर्पण करना)]
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार: https://granthams.koyil.org/2021/03/08/srivachana-bhushanam-suthram-57-english/
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