श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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इसके अतिरिक्त, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यह सिद्धांत वेद के अनुकूल है”।

सूत्रं १४९

इव्वर्त्तत्तै वेद पुरुषन्‌ अपेक्षित्तान्‌।

सरल अनुवाद

वेदपुरुष (वेदों का साक्षात रूप) इस [पिछले सूत्र में समझाया गया] सिद्धांत से सहमत हैं ।

व्याख्या

इव्वर्त्तत्तै 

इव्वर्त्तम्‌

परगत स्वीकारम् (भगवान स्वयं चेतन का अनुसरण करना), जिसे बड़ी दृढ़ता से समझाया गया।

वेद् पुरुषन्‌ अपेक्षित्तान्‌

क्योंकि इसे कठवल्ली उपनिषद और मुण्डकोपनिषद में इस प्रकार समझाया गया है:

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैश वृणुते तेन लभ्या: तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ([यह परमात्मा] भक्ति के बिना श्रवण, स्मरण और ध्यान से प्राप्त नहीं किया जा सकता। जो भी परमात्मा द्वारा वरण किया जाता है, वही उसे प्राप्त करता है। यह परमात्मा उसे अपना दिव्य रूप प्रकट करता है।)

इस कारण यह सिद्धांत वेदपुरुष को भी स्वीकार्य है। पुनरावृत्ति (दो उपनिषदों में आना) उत्सुक स्वीकृति का संकेत देती है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/03/srivachana-bhushanam-suthram-149-english/

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