श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
अब, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि चेतन का सर्वेश्वर के स्वतंत्रता (स्वेच्छा) के कारण भगवान के अधीन होने से अधिक
अवतारिका
अब, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि जब चेतन को भगवान की खोज करते देखकर उनकी दया के कारण उसका अधीन होने से अधिक प्रभावशाली/शक्तिशाली है जब सर्वेश्वर के स्वतंत्रता (स्वेच्छा) के कारण चेतन के अधीन होते हैं।
सूत्रं – १४८
कृपैयाले वरुम् पारतन्त्र्यत्तिऱ् काट्टिल स्वातन्त्र्यत्ताले वरुम् पारतन्त्र्यम् प्रबलम् |
सरल अनुवाद
भगवान की स्वेच्छा से चेतन के प्रति अर्जित की गई अधीनता उनकी दया से अर्जित की गई अधीनता से अधिक प्रबल है।
व्याख्या
कृपैयाले…
अर्थात् – ईश्वर के पास चेतनों के अधीन होने के दो मार्ग हैं। वे हैं:
- जब चेतन अत्यधिक दुःख के कारण बिना किसी शरण के उनके दिव्य चरणों में आकर शरण लेते हैं तो उनकी दया के कारण वे उनके वचनों का पालन करने के लिए वशीभूत हो जाते हैं।
- जिस प्रकार एक राजसी गज या राजा अपने राज्य के लिए उत्तराधिकारी का चयन करता है, उसी प्रकार भगवान भी अपनी अनियंत्रित स्वतंत्रता के कारण, अहैतुक कुछ चेतनाओं को स्वीकार करते हैं और स्वयं को उनके अधीन कर देते हैं।
इन दो प्रकारों में से प्रथम प्रकार उनकी स्वतंत्रता को रोककर विफल हो सकता है। किंतु द्वितीय मार्ग कभी विफल नहीं होगा क्योंकि इसे किसी और वस्तु से नहीं रोका जा सकता। इसलिए दूसरा प्रकार अधिक दृढ़ है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/02/srivachana-bhushanam-suthram-148-english/
संगृहीत- https://granthams.koyil.org/
प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org