श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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अवतारिका

इसके पश्चात, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी इस  [जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के सम्बन्ध को न छोड़ने का सिद्धांत, जो अम्माजी की गवाही में स्थापित किया गया था] सिद्धांत का प्रमाण दे रहे हैं ।

सूत्रं १५७ 

“ऎन्नै नॆगिऴ्क्किलुम्‌” “कोल मलर्प्पावैक्कु अन्बागिय”

सरल अनुवाद

श्रीसहस्रगीति १.७.८ ऎन्नै नॆगिऴ्क्किलुम्‌ (जो नप्पिन्नै पिराट्टी को आलिंगन किए हुए हैं – भले ही मैं उन्हें छोड़ने के लिए राजी हो जाऊँ, तब भी वे मेरे हृदय से अलग नहीं हो सकते), श्रीसहस्रगीति १०.१०.७ कोल मलर्प्पावैक्कु अन्बागिय (जो श्रीमहालक्ष्मी के प्रिय हैं – आपको प्राप्त करने और आपको पूर्ण रूपेण अपने हाथों में लेने के पश्चात, क्या मैं आपको जाने दूँगा?)

व्याख्या

ऎन्नै…

क्योंकि श्रीसहस्रगीति १.७.८ “ऎन्नै नॆगिऴ्क्किलुम्‌”  में कहा गया है, “नप्पिन्नै पिरट्टी के पुरुषकार पर, नित्यसुरियों की उपस्थिति में स्वीकार किए जाने के पश्चात, सर्वशक्तिमान भगवान मुझे नहीं छोड़ेंगे”, इसलिए यह पद्य इस बात का प्रमाण है कि भगवान इस संबंध को रद्द (अमान्य) नहीं कर सकते।

क्योंकि श्रीसहस्रगीति १०.१०.७ “कोल मलर्प्पावैक्कु अन्बागिय” में कहा गया है, “चूँकि वह श्रीमहालक्ष्मी (अम्माजी/पेरिय पिराट्टि) के प्रति मित्रवत हैं, इसलिए उनके सेवकों में से एक होने के नाते, मेरे प्रति भी उनकी अगाध मित्रता है; अत्यंत प्रयास से मेरा अनुगमन करने के पश्चात, क्या मैं तुम्हें जाने दूँगा?”, इसलिए यह पद्य इस बात का प्रमाण है कि चेतन पुरुषकार की उपस्थिति में स्थापित इस संबंध को रद्द (अमान्य) नहीं कर सकता।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/11/srivachana-bhushanam-suthram-157-english/

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