श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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अवतारिका

वह चेतन जिसने सदा भगवान से मुँह मोड़ लिया था, आज ही भगवान की ओर मुख (ईश्वर अभिमुख होना) किया है; क्या होगा यदि वह चेतन, भौतिक शरीर धारण करके इस संसार में लिप्त होने के कारण, बुरे कर्मों के प्रभाव से अपने पूर्ववत हो जाए और अपने (संरक्षित) और भगवान (रक्षक) के मध्य उस सम्बन्ध को त्याग दे जो उसकी शरणागती और भगवान की स्वीकृति से उत्पन्न हुआ था; अथवा, क्या होगा यदि ईश्वर, जो अनियंत्रित रूप से स्वतंत्र होते हुए, जिन्होंने कर्मों के कारण इस चेतन को इस संसार में सदा के लिए बाँधकर रखा था, एक बार चेतन को स्वीकार करने के पश्चात कर्मों के अनुसार पुनः चेतन का संचालन करने का निर्णय लें? श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक यहाँ इसका उत्तर देते हैं।

सूत्रं – १५६

ससाक्षिकम्‌ आगैयाले इप्पन्धत्तै इरुवरालुम्‌ इल्लै सॆय्यप्‌ पोगादु।

सरल अनुवाद

क्योंकि यह सम्बन्ध अम्माजी की साक्षि में स्थापित हुआ था, इसलिए इसे चेतन और ईश्वर दोनों द्वारा अमान्य नहीं किया जा सकता है।

व्याख्या 

ससाक्षिकम्‌ …अर्थात् – क्योंकि यह रक्ष्य-रक्षक सम्बन्ध श्रीमहालक्ष्मी की उपस्थिति में हुआ है, जो पुरुषकार (चेतन और भगवान का मिलन) कर रही हैं, न कि चेतन या भगवान के व्यक्तिगत प्रयासों से, इसलिए इसे उनमें से किसी के द्वारा भी अमान्य नहीं किया जा सकता है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/11/srivachana-bhushanam-suthram-156-english/

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