श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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अवतारिका

जब पूछा गया, “यदि भक्त इस प्रकार भगवान से प्रार्थना करे [दिव्य लोकों से आसक्त रहने के लिए], तो क्या लक्ष्य प्राप्त करने के पश्चात भी वे उसके प्रिय बने रहेंगे?” तो श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक उत्तर दिया।

सूत्रं – १७४

प्राप्य प्रीति विषयत्वत्तालुम्‌ कृतज्ञतैयालुम्‌ पिन्बु अवै अभिमतङ्गळाय्‌ इरुक्कुम्‌।

सरल अनुवाद

वे दिव्य क्षेत्र तदनंतर भी उन्हें प्रिय बने रहेंगे, क्योंकि उनके भक्तों को प्रिय होने के नाते और उनकी [भगवान की] कृतज्ञता के कारण।

व्याख्या

प्राप्य …

प्राप्य प्रीति विषयत्वम्‌ 

भक्त जो भगवान का लक्ष्य है, उसके लिए यह दिव्य स्थल आनंददायक रहता है। वह दिव्य स्थल में पूर्ण भाव से मग्न रहता है जैसा कि तिरुक्कुरुन्ताण्डगम्‌ १९ में कहा गया है “कण्डीयूर्‌ अरङ्गम्‌ मॆय्यम्‌ कच्चि पेर्‌ मल्लै ऎन्ऱे मण्डिनार्‌” (भक्त तिरुक्कण्डियूर्‌, श्रीरंगम्, तिरुमॆय्यम्‌, काँचीपुरम्, तिरुप्पेर्‌ नगर्‌ एवं तिरुक्कडल्मल्लै से अत्यधिक जुड़े हुए हैं)।

कृतज्ञतै

भगवान उन दिव्य स्थलों द्वारा किए गए उपकारों के विषय में सोच रहे हैं जैसे कि “क्या इन्हीं दिव्य क्षेत्रों के कारण हमें यह भक्त प्राप्त नहीं हुआ?”

इन दो कारणों से, भले ही यह चेतन, जो कि लक्ष्य है, प्राप्त हो जाए, भगवान दिव्य धामों को अपने लिए प्रिय मानते रहेंगे।

अतः, निम्नलिखित विषयों की व्याख्या की गई है – 

  • [सूत्रं १६४] दोष निवृत्ति (शरीर का निष्कासन) पूर्व में वर्णित श्रेष्ठ गुणों जैसे शेषत्व और पारतंत्र्य के समान है [अर्थात, जब भगवान द्वारा इच्छा की जाए, तो ऐसे विचारों का त्याग करना आवश्यक है]।
  • यह कहते हुए [सूत्रं १६३ में] कि यह भगवान के आनंद में बाधा बनेंगे और उस तातपर्य पर विस्तार से बताते हुए, समझाया कि प्रिय व्यक्ति की मलिनता/स्वेद कैसे वांछित है।
  • भगवान चेतन (भक्त) के शरीर की कितनी तीव्र इच्छा रखते हैं जिसे चेतन तिरुविरुत्तम् १ में “अऴुक्कुडम्बु”  (मलिन शरीर) कहकर मलिन मानते हैं।
  • ज्ञानी (महान भक्त) चेतन को भगवान शरीर सहित क्यों चाहते हैं, इसका विशेष कारण है। 
  • हम इस शरीर में [इसका त्याग करने के पश्चात भी] ऐसे चेतन के अस्तित्व को देखकर ही भगवान की चेतन के शरीर के प्रति इच्छा को समझ सकते हैं।
  • किस प्रकार भगवान चेतन के शरीर की कामना करते हैं।
  • जब भगवान लक्ष्य (चेतन का शरीर) प्राप्त कर लेते हैं, तो साधनों (दिव्य निवासों) के प्रति उनका लगाव कैसे कम हो जाता है और इस परिमाण के प्रभाव की अंतिम अवस्था क्या होती है।
  • जब चेतन प्रार्थना करता है, “आपको उन दिव्य धामों को नहीं छोड़ना चाहिए”, तो लक्ष्य प्राप्ति के उपरांत भी वे दिव्य धाम दो कारणों से भगवान के प्रिय क्यों रहते हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/28/srivachana-bhushanam-suthram-174-english/

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