श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
इस प्रकार – सूत्रं १४५ “नन्मैताने तीमैयाय्त्तु” (अच्छे गुण हानिकारक हो जाते हैं), सूत्रं १६० “तनक्कुत् तान् तेडुम् नन्मै तीमैयोपादि विलक्काय् इरुक्कुम्” (स्वयं के प्रयासों से अपने लिए अच्छाई ढूँढ़ने का स्वभाव उसी प्रकार त्याग देना चाहिए जैसे बुरे विषयों को त्याग दिया जाता है) और सूत्रं १७६ “दोष निवृत्तिताने दोषमामिऱे” (शरीर को नष्ट करने की प्रार्थना करना स्वयं में एक दोष है) में कहा गया है कि “स्वयं के लिए चाही गई अच्छाई का अनुसरण किया जाना चाहिए”; इस प्रकार, स्वयं से सत्कार प्राप्त करने की इच्छा को त्याग देना और भगवान द्वारा प्रदत्त सत्कार की प्राप्ति को एक विश्वसनीय व्यक्तित्व के शब्दों के माध्यम से और अधिक स्पष्ट किया गया है।
सूत्रं – १७७
“तन्नाल् वरुम् नन्मै विलैप्पाल्पोले, अवनाल् वरुम् नन्मै मुलैप्पाल्पोले” ऎन्ऱु पिळ्ळान् वार्त्तै ।
सरल अनुवाद
कुरुगाधीश स्वामी (पिळ्ळान्) कहते हैं, “अपने प्रयासों से अर्जित अच्छाई पैसे से क्रय किए गए दूध के समान है, जबकि भगवान की कृपा से अर्जित अच्छाई माँ के दूध के समान है।”
व्याख्या
तन्नाल् …
तन्नाल् वरुम् नन्मै
अपने स्वयं के प्रयासों से स्वयं के लिए अर्जित की गई भलाई।
विलैप्पाल्
औपाधिक (स्वाभाविक नहीं, किसी कारण से प्राप्त), विरस (स्वादिष्ट नहीं) और अप्राप्त (उपयुक्त नहीं)।
अवनाल् वरुम् नन्मै
निरुपाधिक स्वामी (वास्तविक स्वामी) भगवान द्वारा अपनी इच्छा से प्रदान की गई अच्छाई।
मुलैप्पाल्
निरुपाधिकम् (प्राकृतिक), सरसम् (स्वादिष्ट) और प्राप्तम् (उपयुक्त/योग्य)।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/31/srivachana-bhushanam-suthram-177-english/
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