श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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जब पूछा गया, “यह [जैसा कि पिछले सूत्रं में है] कहने में , दोष [शरीर] को दूर करने में क्या दोष है?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक कहा, “अलग से दोष की कोई आवश्यकता नहीं है, यह स्वयं ही एक दोष है।”

सूत्रं – १७६

दोष निवृत्तिताने दोषमामिऱे।

सरल अनुवाद

दोष (शरीर) को दूर करना (अथवा दूर करने की इच्छा रखना) अपने आप में एक दोष है।

व्याख्या

दोष

अर्थात्, जिस प्रकार एक कामुक स्त्री अपने शरीर से मैल/ स्वेद पोंछकर अपने प्रियतम के साथ आनंद लेना चाहती है उसी प्रकार जीवात्मा अपने शरीर को जो स्वाभाविक रूप से शुद्ध आत्मा का अंग है त्यागने का प्रयास करता है और उसे अपने स्वामी भगवान को अर्पित करने के लिए विवश करता है। शरीर को त्यागने का ऐसा प्रयास भगवान की इच्छा के विपरीत है क्योंकि भगवान अपने शरीर सहित आत्मा का आनंद लेना चाहते हैं ठीक उसी प्रकार जैसे एक कामुक पुरुष अपनी प्रियतमा के साथ उसके मैल/स्वेद सहित आनंद लेना चाहता है। अतः यह अपने आप में एक दोष है। जो भगवान को अप्रिय है, वह दोष है।

इऱे

इससे इस सिद्धांत की सुप्रसिद्ध प्रकृति का पता चलता है जिसे अब तक स्पष्ट किया जा चुका है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/30/srivachana-bhushanam-suthram-176-english/

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