श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

पूरी श्रृंखला

<< पूर्व

अवतारिका

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक उन लोगों के मध्य अंतर समझा रहे हैं जो सांसारिक सुखों के स्वभाव को जाने बिना उनमें लिप्त हैं और उन लोगों के मध्य जो सांसारिक सुखों के स्वभाव को भली-भाँति जानते हुए उनमें लिप्त हैं।

सूत्रं – १८७

अज्ञान विषय प्रवणन्‌ केवल नास्तिकनैप्पोले; ज्ञानवानान विषय प्रवणन्‌ आस्तिक नास्तिकनैप्पोले।

सरल अनुवाद

सांसारिक सुखों में लिप्त अज्ञानी व्यक्ति शुद्ध नास्तिक के समान होता है; सांसारिक सुखों में लिप्त ज्ञानी व्यक्ति आस्तिक नास्तिक के समान होता है (जो दिखावे के लिए आस्तिक होता है, परन्तु हृदय से नास्तिक होता है)।

व्याख्या

अज्ञान …

अज्ञान विषय प्रवणन्‌ 

जो सांसारिक सुखों के असंख्य दोषों को नहीं समझता और यह नहीं जानता कि वे आत्मा के सच्चे स्वरूप के विपरीत हैं, तो भी वह उत्सुकतापूर्वक उनका आनंद लेता है।

केवल नास्तिकन्‌

शुद्ध नास्तिक जो धर्म (धार्मिकता), अधर्म, परलोक (परमपदम), चेतन (संवेदनशील प्राणी), ईश्वर (भगवान) आदि को प्रकट करने वाले शास्त्र की प्रामाणिकता को स्वीकार किए बिना स्वतंत्र रूप से घूमता है।

ज्ञानवानान विषय प्रवणन्‌

वह व्यक्ति जो सांसारिक सुखों के असंख्य दोषों को समझता है और यह भी जानता है कि वे आत्मा के सच्चे स्वरूप के विपरीत हैं, तब भी उत्सुकतापूर्वक उनका आनंद लेता है।

आस्तिक नास्तिकन्‌

क्योंकि वह धर्म, अधर्म आदि को प्रकट करने वाले शास्त्र को प्रामाणिक मानता है, इसलिए उसे आस्तिक कहा जा सकता है और क्योंकि वह ऐसे शास्त्र की सीमाओं का पालन नहीं करता है इसलिए उसे नास्तिक कहा जा सकता है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/10/srivachana-bhushanam-suthram-187-english/

संगृहीत- https://granthams.koyil.org/

प्रमेय (लक्ष्य) – https://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – https://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – https://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Leave a Comment