श्रीवचन भूषण – सूत्रं १८८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक उन दो प्रकार के व्यक्तित्वों के मध्य में अंतर स्पष्ट करते हैं जिन्हें उदाहरण के रूप में दिखाया गया है।

सूत्रं – १८८

केवल नास्तिकनैत्‌ तिरुत्तलाम्‌; आस्तिक नास्तिकनै ऒरुनाळुम्‌ तिरुत्त ऒण्णादु.

सरल अनुवाद

शुद्ध नास्तिक को सुधारा जा सकता है; नास्तिक आचरण वाला आस्तिक को कभी नहीं सुधारा जा सकता।

व्याख्या

केवल

अर्थात्, जो शास्त्रों को अस्वीकार करता है और अपनी इच्छानुसार कार्य करता है उसे शास्त्रों में आस्था रखने की सलाह देकर विधि (निर्धारित कर्मों) और निषिद्ध कर्मों के बद्ध होने के लिए सुधारा जा सकता है; परन्तु जो शास्त्रों में आस्था रखता है और शास्त्रों के सार को जानता है फिर भी नास्तिक की तरह स्वतंत्र रूप से पापों के भय के बिना कार्य करता है, उसे सुधारा नहीं जा सकता क्योंकि उसे सलाह देने के लिए कुछ भी नया नहीं है।

इससे यह समझाया जाता है कि सांसारिक सुखों में लिप्त अज्ञानी व्यक्ति को सांसारिक सुखों के दोष आदि के विषय में उपदेश देकर सुधारा जा सकता है परन्तु सांसारिक सुखों में लिप्त ज्ञानी व्यक्ति को सुधारा नहीं जा सकता क्योंकि वह दोषों को भली-भांति जानता है फिर भी उनमें लिप्त रहता है। अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ज्ञानलव दुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं रञ्जयति (अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रों का ज्ञान सरल्ता से दिया जा सकता है; ज्ञानी व्यक्ति को भी आसानी से ज्ञान दिया जा सकता है; परन्तु जो व्यक्ति थोड़ा ज्ञान रखता है और उस पर अभिमान करता है, उसे ब्रह्मा भी सुधार नहीं सकते)। अतः सांसारिक सुखों में लिप्त ज्ञानी व्यक्ति सांसारिक सुखों में लिप्त अज्ञानी व्यक्ति की तुलना में बहुत नीच होता है।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/11/srivachana-bhushanam-suthram-188-english/

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