श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के दिव्य नाम – माऱन्, नावीरर्

श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः।

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३. माऱन् 

माऱन् एक तमिऴ् नाम है। माऱन् का अर्थ है, वह व्यक्ति जो सामान्य लोगों से पूर्णतः भिन्न और विलक्षण हो।

श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) का सम्पूर्ण जीवन सांसारिक एवं विषयासक्त लोगों से सर्वथा भिन्न था। एवं विषयासक्त लोगों से पूर्णतः भिन्न था। उनके दिव्य अवतार के समय उन्होंने न तो मातृदुग्ध का पान किया, न ही किसी अन्य प्रकार का आहार ग्रहण किया। इतना ही नहीं, उन्होंने जन्म लेने वाले सामान्य शिशुओं की भाँति रुदन भी नहीं किया। 

बाल्यावस्था में भी उन्होंने दूसरे बच्चों के जैसे बाहर जाकर खेल-कूद या बालकों जैसी लीलाएँ नहीं कीं। 

युवावस्था प्राप्त होने पर भी सामान्य युवकों के जैसे इन्द्रिय-विषयों एवं सांसारिक भोगों में कभी प्रवृत्त नहीं हुए।

इस प्रकार वे प्रत्येक दृष्टि से सामान्य संसारिक लोगों से बहुत अलग रहे। 

केवल इतना ही नहीं, वे समस्त आऴ्वारों में भी अपनी विशिष्ट महिमा के कारण अद्वितीय हैं। इसका कारण यह है कि वे एकमात्र ऐसे आऴ्वार् हैं जिन्हें ओराण् वऴि आचार्य-परम्परा (सम्प्रदाय-प्रवर्तक आचार्य-परम्परा) में स्थान प्राप्त है। आचार्य-परम्परा में वे चतुर्थ आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं। 

इसी कारण वे समस्त आऴ्वारों में भी विशिष्ट, श्रेष्ठ एवं अद्वितीय माने जाते हैं। 

अतः उन्हें ‘अवयवी’ अर्थात् सम्पूर्ण स्वरूप कहा गया है, जबकि अन्य सभी आऴ्वार् ‘अवयव’, अर्थात् उनके अंगस्वरूप माने गए हैं। 

यही श्री शठकोप स्वामी की विलक्षण एवं अनुपम महिमा है।

इसी विशेषता के कारण वे “माऱन्” नाम से प्रसिद्ध हुए।

४. नावीरर् 

नावीरर् भी एक तमिऴ् नाम है। नावीरर्  का अर्थ है, जो अपनी वाणी में परम पराक्रमी हो, जिसकी विजय का साधन उसकी दिव्य वाणी हो।

सामान्यतः किसी को विजय प्राप्त करनी हो तो उसे युद्धभूमि में उतरकर संघर्ष करना पड़ता है। किन्तु श्री शठकोप स्वामी ने ऐसा नहीं किया। वे सदैव पवित्र इमली (तिरुप्पुलियाऴ्वार्) के दिव्य वृक्ष के नीचे ही विराजमान रहे।

फिर भी उन्होंने विभिन्न सम्प्रदायों के महान विद्वानों एवं अनेक मतों के दार्शनिकों का अपनी दिव्य वाणी के प्रभाव से खण्डन कर उन्हें पराजित किया। 

अपने दिव्यप्रबन्ध के दिव्य पाशुरों के माध्यम से उन्होंने समस्त प्रतिपक्षी सिद्धान्तों का निरसन कर श्रीसम्प्रदाय के सिद्धान्त की विजय स्थापित की।

तिरुवायमोऴि के ४.१० दशक “ओन्ऱुम् देवुम् उलगुम् उयिरुम्”,  जो आऴ्वार् तिरुनगरी के अधिदेवता श्री आदिनाथ भगवान् की शरणागति  में है, उसमें श्री शठकोप स्वामी यह सिद्ध करते हैं कि भगवान् श्रीमन्नारायण की परमश्रेष्ठता उनके अर्चावतार (अर्चा-विग्रह) में भी पूर्णतः प्रकाशित एवं प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है।

इसी दशक के “इलिङ्गत्तिट्ट पुराणत्तीरुम्” पाशुर में वे यह प्रतिपादित करते हैं कि समस्त देवता भगवान् श्रीमन्नारायण के अधीन हैं तथा उन्हीं पर आश्रित हैं।

इस प्रकार श्री शठकोप स्वामी ने केवल अपनी दिव्य वाणी के प्रभाव से ही समस्त मतों पर विजय प्राप्त की। इसी कारण वे “नावीरर्” अर्थात् वाणी के परम वीर—के नाम से विख्यात हुए।

अडियेन् श्यामसुंदर रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2026/07/01/nammazhwars-divine-names-maran-navirar/

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