श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
इतना ही नहीं, मध्यस्थता का एक अन्य उद्देश्य भी है।
सूत्रं – १५३
स्वरूप सिद्धियुम् अत्ताले।
सरल अनुवाद
इससे व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का भी ज्ञान होता है।
व्याख्या
स्वरूप …
स्वरूप – चेतन के लिए यह ‘तदीय पारतंत्र्यम्’ (भगवान के स्वामित्व वाली श्रीजी पर आश्रित होना) है; ईश्वर के लिए यह ‘आश्रित पारतंत्र्यम्’ (भगवान की भक्त श्रीजी पर आश्रित होना) है। श्रीसहस्रगीति (तिरुवाय्मोऴि) २.७.४ “देवुम् तन्नैयुम्” में श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) कृपापूर्वक समझाते हुए “तन्नै” (उनकी सरलता का सच्चा स्वरूप) को उनके भक्तों द्वारा नियंत्रित बताते हैं। पुरुषकार के उत्तम कृत्य द्वारा चेतन और ईश्वर में ये दोनों सिद्ध होते हैं।
अडियेन् केशव रामानुज दास
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