श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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अवतारिका

पूर्व [सूत्र १५६] में ससाक्षिकम्‌ आगैयाले इप्पन्धत्तै इरुवरालुम्‌ इल्लै सॆय्यप् पोगादु कहा गया था जो कि चेतन और ईश्वर दोनों का, साक्षी पुरुषकार [पिरट्टी] के प्रति नित्य पारतंत्र्यम् (शाश्वत, संपूर्ण निर्भरता) पर आधारित है; इसलिए, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी उन दोनों के नित्य पारतंत्र्यम् के लिए प्रमाण दिखा रहे हैं।

सूत्रं – १५८

कर्मणि व्युत्पत्तियिल् स्वरूप गुणङ्गळाल्‌ वरुगिऱ कर्तृ सङ्कोच राहित्यत्तै निनैप्पदु।

सरल अनुवाद

चेतन और ईश्वर की सेवा में निहित बंधनों के अभाव के विषय में विचार करें, जो क्रमशः उनके वास्तविक स्वरूप और गुणों पर आधारित है,  जिनके लिए कर्मवाच्य क्रिया का प्रयोग किया गया है।

व्याख्या

कर्मणि

कर्मणि व्युत्पत्ति  

शब्द की व्युत्पत्ति में “श्रिङ्ग् – सेवायाम्‌” (सेवा करना) कर्मणि व्युत्पत्ति (कर्मवाच्य) “श्रियते” के माध्यम से व्यक्त होती है। इसका अर्थ है उनकी सेवा की जाती है।

इस प्रयोग में,

स्वरूप गुणङ्गळाल्‌ वरुम्‌ कर्तृत्व सङ्कोच राहित्यम्‌ 

शेषत्व और प्रणयित्व (प्रियतम होने) के सच्चे स्वरूप के आधार पर सेवकों अर्थात् चेतन (आत्मा) और परमचेतन (परमेश्वर) के लिए उनकी सेवा में कोई बंधन नहीं होगा। अर्थात् पिरट्टी के प्रति चेतन और ईश्वर दोनों की सेवा निर्बाध रूप से चलती रहेगी।

निनैप्पदु 

चेतन और ईश्वर दोनों की पिराट्टी पर पूर्ण निर्भरता के बारे में विचार करें।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/07/12/srivachana-bhushanam-suthram-158-english/

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