श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी एक अन्य मार्ग से अपने भक्त के दिव्य शरीर के प्रति भगवान के प्रेम को उजागर करते हैं।
सूत्रं – १६९
परमार्तनान इवनुडैय शरीर स्थितिक्कु हेतु, केवल भगवदिच्छैयिऱे।
सरल अनुवाद
भौतिक संसार में रहने के कष्ट को सहन न कर पाने के कारण अत्यंत व्यथित हुए इस भक्त के अस्तित्व का कारण, केवल भगवान की इच्छा है।
व्याख्या
परमार्तनान …
परमार्तन्
वह जो अत्यधिक पीड़ा से व्याकुल है
- अडिक्कॊदिप्पु (पैरों के नीचे तपती उष्णता) जैसा कि तिरुविरुत्तम् १ में कहा गया है “इन्निन्ऱ नीर्मै इनि याम् उरामै” (मैं यहाँ नीच जीवन को सहन नहीं कर सकता), श्रीसहस्रगीति ३.२.१ “ऎन्नाळ् यान् उन्नै इनि वन्दु कूडुवन्” (मैं कब आऊँगा और आपके साथ एकजुट होऊँगा), श्रीसहस्रगीति ३.२.९ “ऎङ्गिनित् तलैप्पॆय्वन्” (पहले चूक जाने के पश्चात, मैं आप तक कहाँ पहुँचूंगा?) श्रीसहस्रगीति ९.८.४ “नाळेल् अरियेन् ” (मुझे नहीं पता कि मैं तुम तक कब पहुँचूंगा), श्रीसहस्रगीति ५.८.७ “दरियेन् इनि” (मैं अब और नहीं टिक सकता) और श्रीसहस्रगीति ६.९.९ “कूविक् कॊळ्ळुम् कालम् इन्नम् कुऱुगादो” (क्या इस अवस्था में भी मुझे उन दिव्य चरणों में संलग्न होने के लिए आमंत्रित करने का समय शीघ्र नहीं आएगा?), और
- भगवान के साथ आनंद लेने से उत्पन्न होने वाली तीव्र प्यास।
प्रारब्ध कर्म (वह कर्म जिसका फल मिलना प्रारम्भ हो गया है) को ऐसे संतप्त भक्त का कारण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह श्रीभगवत गीता १८.६६ में कही गई बात “सर्व पपेभ्यो मोक्षयिष्यामि” (मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति प्राप्त कराऊँगा) के विपरीत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रपत्ति (समर्पण) की प्रकृति श्री पांचरात्र में बताई गई है “आर्तानाम् आशुपलदा सकृदेव कृताह्यसौ । दृप्तानामपि जन्तूनां देहान्तर निवारिणी ॥” (क्या एक बार की गई प्रपत्ति (शरणागति) व्यथित व्यक्ति को शीघ्र ही फल नहीं देगा और क्या इसी से संतुष्ट चेतनों के लिए अगला जन्म समाप्त नहीं कर देगा?) अतः इस संसार में भक्त के शरीर का अस्तित्व ईश्वर की इस इच्छा से है कि “मैं कुछ समय के लिए इसी शरीर में उसका आनंद ले सकूँ”। यही कारण है कि श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी “केवल भगवदिच्छैयिऱे” कह रहे हैं (यह भगवान की अनन्य इच्छा है)। क्योंकि दृप्त प्रपन्न (जो इस जन्म के अंत में फल प्राप्त करने से संतुष्ट होते हैं) में प्रारब्ध कर्म के अतिरिक्त भगवान की इच्छा का भी तत्त्व होता है, इसलिए यहाँ “केवल” शब्द जोड़कर उसे विभेदित किया जा रहा है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/23/srivachana-bhushanam-suthram-169-english/
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