श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक एक उदाहरण देकर समझाते हैं कि भगवान को आऴ्वार् के दिव्य शरीर से न केवल उस प्रकार लगाव है जैसे किसी व्यक्ति को अपने प्रियतम के मैल से होता है, परंतु साथ ही उसमें प्रकट ज्ञान की सुगंध के कारण भी आऴ्वार् के दिव्य शरीर से लगाव है।
सूत्रं – १६८
वेर्च् चूडुमवर्गळ् मण् पट्रुक् कऴट्रादाप्पोले ज्ञानियै विग्रहत्तोडे आधरिक्कुम्।
सरल अनुवाद
जिस प्रकार कुछ जड़ों को [सजावट के रूप में] सिर पर धारण करने वाले लोग जड़ से मिट्टी नहीं हटाते, उसी प्रकार भगवान शरीर सहित ज्ञानी (महान भक्त) की कामना करते है।
व्याख्या
वेर् …
अर्थात् – जो लोग जड़ की सुगंध को जानकर उसे धारण करने में आनंद पाते हैं वे मिट्टी सहित जड़ को धारण करेंगे यह सोचकर कि “मिट्टी हटा देने से जड़ की सुगंध कम हो जाएगी”; इसी प्रकार, सर्वेश्वर, जो परम आनंद भोगने वाले हैं, ज्ञानी का आनंद लेते हुए ऐसे ज्ञानी की कामना उसके शरीर सहित करते हैं, जो ज्ञान का सुगंध प्रकट करता है और ऐसे ज्ञान से उत्पन्न होने वाली आनंदमय प्रतिक्रियाओं का निवास स्थान है जैसा कि “आह्लाद शीत नेत्राम्भुः पुळकीक्रुत गात्रवान् । सदा परगुणाविष्टः द्रष्टव्यः सर्व देहिभिः।।” (परमात्मा के गुणों का सदा आनंद लेने के कारण, परमपिता के गुणों का आनंद लेने से शीतल आँसुओं से भरे, शरीर पर रोंगटे खड़े होने के कारण ऐसे भक्तों का दर्शन सभी द्वारा किया जाना चाहिए) में कहा गया है।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/22/srivachana-bhushanam-suthram-168-english/
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