श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक ‘कर्म-चाण्डाल’ (जो अपने अपराधों के कारण चाण्डाल बन जाता है) की नीची स्थिति को ‘जाति-चाण्डाल’ (जो चाण्डाल परिवार में पैदा हुआ हो) की तुलना में समझाते हैं ताकि कोई यह न सोचे कि वह भी किसी दिन वैसे ही मुक्त हो जाएगा जैसे एक चाण्डाल हो सकता है।
सूत्रं – १९९
जाति चण्डाळनुक्कु कालान्तरत्तिले भागवतन् आगैक्कु योग्यतै उण्डु, अदुवुम् इल्लै इवनुक्कु।
सरल अनुवाद
जाति-चाण्डाल के लिए भविष्य में भागवत बनने का अवसर होता है, लेकिन कर्म-चाण्डाल के लिए यह भी संभव नहीं है।
व्याख्या
जाति चण्डाळनुक्कु …
यानी, एक जाति-चाण्डाल के लिए चाहे इसी जन्म में या किसी अगले जन्म में एक विशेष समय पर जब उसे भगवान की दयाभरी दृष्टी मिलती है तो वह भगवान से जुड़ने की योग्यता पा लेता है—[एक वैष्णव के रूप में] नाम और रूप के साथ। लेकिन जिस पापी ने भगवान के भक्तों (भागवतों) के प्रति अपराध किया हो उसे ऐसी योग्यता भी नहीं मिल पाती।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/22/srivachana-bhushanam-suthram-199-english/
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