श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम:

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जब पूछा गया कि “परंतु भगवान चेतन से कैसे प्रसन्न होंगे?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं।

सूत्रं १३७

आभिमुख्य सूचक मात्तिरत्तिले सन्तोषम् विळैयुम्।

सरल अनुवाद

चेतन के अनुकूल चित्त को देखकर ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।

व्याख्या

आभिमुख्य……

अर्थात् – जैसे कि तिरुविरुत्तम् ९५ में कहा गया है,  “यादानुम् पट्रि नीङ्गुम् विरदत्तै” (किसी भी मार्ग से भगवान को छोड़ने का व्रत अनुष्ठान करते हुए) चेतन जो अब तक भगवान के साथ का विरोध करता रहा था, वह ऐसी मनोवृत्ति त्यागकर अपने अनुकूल अभिप्राय को प्रकट करने वाला कार्य करता है, भगवान यह देखकर सोचते हैं कि “जो सदा मेरे साथ का प्रतिरोध कर रहा था वह अब अनुकूल हो गया है!” और अपने दिव्य हृदय में प्रसन्न हो जाते हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/21/srivachana-bhushanam-suthram-137-english/

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