श्रीवचन भूषण – सूत्रं २०२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी इस प्रश्न का दयापूर्वक उत्तर देते हैं कि “क्या इसके लिए कोई प्रमाण (धर्मग्रंथों का आधार) है [कि भागवत अपचार व्यक्ति की योग्यता पर आधारित नहीं होता]?”

सूत्रं – २०२

“तमर्गळिल्‌ तलैवराय सादि अन्दणर्गळेलुम्‌” ऎङ्गैयाले

सरल अनुवाद

तिरुमालै ४३ में कहा गया है: “तमर्गळिल्‌ तलैवराय सादि अन्दणर्गळेलुम्‌”  (भले ही कोई ब्राह्मण कुल के अधिपति भी किसी भागवत के विरुद्ध कोई अपचार करे…)।

व्याख्या

तमर्गळिल्‌…

अर्थात – श्री भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी, जो सत्य के सार को जानने वाले हैं, उन्होंने कृपापूर्वक कहा है कि “भले ही कोई व्यक्ति का उच्च कुल (ब्राह्मण) में जन्म हुआ हो, उसने वेदों और उनके अंगों का पूरा ज्ञान प्राप्त किया हो और वह भागवतों में श्रेष्ठ हो, परन्तु अगर वह व्यक्ति श्रीवैष्णवों का – जिनकी पहचान ही आपसे [सर्वेश्वर से] सम्बन्ध से होती है – उनके जन्म आदि के आधार पर अपमान करता है तो वह उसी क्षण इतना नीच चाण्डाल बन जाएगा कि स्वयं चाण्डाल भी ऐसे गिरे हुए व्यक्ति की नकल जैसे लगेंगे।”

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/26/srivachana-bhushanam-suthram-202-english/

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