आचार्य हृदयम् – ३२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः श्रृंखला << आचार्य हृदयम् – ३१ अवतारिका (परिचय) यहाँ इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया गया है कि कर्मनिष्ठ (कर्म करने में एकाग्र) और कैङ्कर्यनिष्ठ (कैङ्कर्य करने में एकाग्र) के मध्य एकता नहीं है। चूर्णिका -३२ साधन साध्यङ्गळिल् मुदलुम् मुडिवुम् वर्णधर्मिगळ् दासवृत्तिगळ् … Read more

श्री रामायण तनि श्लोकम् – ६ – बाल काण्ड २०.२ – ऊनषोडशवर्ष: – भाग १

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः पूरी श्रृंखला << भाग ५ ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन:।न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसै:।। श्री कृष्णपाद आचार्य (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै) ने, जो शरणागति-शास्त्र माना जाता है अर्थात श्रीरामायणम् के अनेक महत्त्वपूर्ण श्लोकों पर अत्यन्त गम्भीर और विस्तृत व्याख्यान लिखा है। इस श्रृंखला में अब तक बालकाण्ड के १९.१४वें … Read more

श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के दिव्य नाम – शठकोप, तोण्डर् पिरान्

श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद्वरवरमुनये नमः। पूरी श्रृंखला << पूर्व १. श्री शठकोप दिव्य नाम की महिमा “शठकोप” नम्माऴ्वार् का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं परम पावन संस्कृत नाम है। स्वयं आऴ्वार् ने भी अपने दिव्यप्रबन्धों में अनेक स्थानों पर इस नाम का उल्लेख किया है। श्रीसम्प्रदाय में इस नाम का इतना माहात्म्य है … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया, “क्या दोष (भौतिक शरीर) को दूर करने पर आत्मा का सच्चा स्वरूप अत्यंत शुद्ध और आनंददायक नहीं होगा? ऐसे में शरीर का निष्कासन अवांछनीय क्यों है और शरीर स्वयं वांछनीय क्यों है?”  श्री पिळ्ळै लोकाचार्य … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इस प्रकार, शेषत्व और पारतंत्र्यम किस प्रकार भगवान के आनंद में बाधा हैं यह कृपापूर्वक समझाने के पश्चात श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक यह समझा रहे हैं कि भगवान को प्राप्त करते समय चेतन द्वारा दोष [शरीर] का बलपूर्वक … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया,  “तो क्या परातंत्र्यम् अच्छा है?”  तो श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने दयापूर्वक उत्तर दिया। सूत्रं – १६३ पुण्यम्पोले पारतन्त्र्यमुम्‌ परानुभवत्तुक्कु विलक्कु। रल अनुवाद जिस प्रकार पुण्य (शेषत्व – दासता) से विमुख होना चाहिए, उसी प्रकार … Read more

श्री शठकोप स्वामी (नम्माऴ्वार्) के दिव्य नाम – नम्माऴ्वार्

श्रीः। श्रीमते शठकोपाय नमः। श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमद् वरवरमुनये नमः। पूरी श्रृंखला “नम्माऴ्वार्” दिव्य नाम की महिमा शठकोप स्वामी को ही नम्माऴ्वार् के नाम से जाना जाता है। परमाचार्य मणवाळ मामुनिगळ् (वरवरमुनि स्वामी) अपने उपदेश रत्नमालै के ५०वें पाशुर में कहते हैं- “नम्पॆरुमाळ्, नम्माऴ्वार्, नन्जीयर्, नम्पिळ्ळै। ऎन्बर् अवरवर् तम् एट्रत्ताल्” । इस सूक्ती में चार … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक यह समझा रहे हैं कि भगवान के वचनों के माध्यम से जो आभूषण सुंदरता बढ़ाने के लिए पहना जाता है, वही आभूषण आनंद के समय बाधा बन जाता है। सूत्रं – १६२ हारोपि … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “शेषत्व (सेवा) जो आत्मा के लिए एक आभूषण है और शेषि (भगवान) द्वारा वांछित है, वह आनंद में बाधा कैसे बन जाता है?” तो श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक व्याख्या की। सूत्रं – … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १६०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला << पूर्व​ अवतारिका इस (तीसरे) प्रकरणम्‌ (भाग) के प्रारंभ में, यद्यपि उपेयाधिकारम्‌ (कैंकर्य के लिए योग्यता) की व्याख्या की गई थी, वह केवल प्रासंगिक थी; अब इस प्रकरण के शेष भाग में, इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है और इस प्रकार … Read more