श्रीवचन भूषण – सूत्रं १७०

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अवतारिका

इसके पश्चात, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं कि भगवान को अपने प्रिय भक्त का शरीर कितना प्रिय होता है।

सूत्रं – १७०

तिरुमालिरुञ्जोलै मलैये” ऎन्गिरपडिये उगन्दरुळिन निलङ्गळ् ऎल्लावट्रिलुम् पण्णुम् विरुप्पत्तै इवनुडैय शरीरैकदेशत्तिले पण्णुम्

सरल अनुवाद

जैसा कि श्रीसहस्रगीति १०.७.८ में कहा गया है, तिरुमालिरुञ्जोलै मलैये (वह मेरे शिरस में उतनी ही रुचि रखता है जितना तिरुमालिरुञ्जोलै  पहाड़ी में) भगवान अपने भक्त के शरीर के एक छोटे से अंग पर उतना प्रेम प्रकट करते हैं जितना सभी दिव्यदेशों के लिए करते हों। 

व्याख्या

तिरुमालिरुञ्जोलै मलैये …

अर्थात् – आऴ्वार् ने कहा, “ईश्वर को तॆऱ्-कु तिरुमलै (दक्षिण दिशा में स्थित दिव्य पर्वत – तिरुमालिरुञ्जोलै),  तिरुपाऱ्-डल (क्षीरसागर) और मेरे सिर इन सभी पर समान रूप से इच्छा थी। उन्हें श्रीवैकुंठ, उत्तर दिशा में स्थित दिव्य पर्वत – तिरुमलै (तिरुपति/तिरुवेङ्गटम्) और मेरे शरीर की भी समान रूप से इच्छा थी।” इस प्रकार, जब आऴ्वार् कहते हैं कि ईश्वर को उनके शरीर का प्रत्येक अंग दो दिव्यदेशों के समान प्रिय है, तो इसका तात्पर्य है कि वे आऴ्वार् के प्रत्येक अंग को सभी दिव्यदेशों के समान ही प्रिय मानते हैं। अतः, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कह रहे हैं, “जैसा कि उस पद्य में कहा गया है, ईश्वर ज्ञानी के प्रत्येक अंग के प्रति उन सभी दिव्यदेशों के समान ही प्रेम प्रकट करेंगे जो उन्हें प्रिय हैं।”

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार – https://granthams.koyil.org/2021/07/24/srivachana-bhushanam-suthram-170-english/

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