श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवर मुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः
अवतारिका (परिचय)
यहाँ इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया गया है कि कर्मनिष्ठ (कर्म करने में एकाग्र) और कैङ्कर्यनिष्ठ (कैङ्कर्य करने में एकाग्र) के मध्य एकता नहीं है।
चूर्णिका -३२
साधन साध्यङ्गळिल् मुदलुम् मुडिवुम् वर्णधर्मिगळ् दासवृत्तिगळ् ऎन्ऱु तुऱैवेऱिडुवित्तदु।
सरल व्याख्या –
वर्णधर्मी जो कर्म पर केंद्रित हैं और दासवृत्ति जो कैङ्कर्य पर केंद्रित हैं, एक साथ नहीं रह सकते इसलिए जो कैङ्कर्यनिष्ठ हैं वे कर्मनिष्ठ का संग त्याग देंगे।
व्याख्यान (टीका)
अर्थात् – साधन (उपाय) का प्रथम चरण कर्म है और साध्य का कैङ्कर्य चरमोपाय है। जिसको यह भली-भाँति ज्ञात हो गया है, वे कहेंगे, “तुम वर्णधर्मी हो और हम दासवृति हैं” और वे वर्णधर्मियों से संबंध विच्छेद कर किसी ओर घाट पर चले जाएँगे। अर्थात – तिरुवहीन्दपुरम् (ऐन्द्रपुरी क्षेत्र) में “विल्लिपुत्तूर्प्पगवर्” नामक एक संन्यासी थे; जब सर्वजन एक घाट पर अपने अनुष्ठान करते थे, तब वे उनसे अलग दूसरे घाट पर अनुष्ठान करते थे। एक दिन जब वे अनुष्ठान पूर्ण कर जा रहे थे, तब वहाँ उपस्थित एक ब्राह्मण ने पूछा, “हे जीयर्! आप हमारे घाट पर अनुष्ठान क्यों नहीं करते?”, तो उन्होंने उत्तर दिया, “विष्णुदासा वयं यूयं ब्राह्मणा वरणधर्मिनः अस्माकं दासवृत्तीनां युष्माकं नास्ति सङ्गति:” (हे ब्राह्मणों! हम विष्णु के दासवृत्तिनिष्ठ (कैङ्कर्य) हैं; और आप ब्राह्मण वर्णधर्मनिष्ठ (केवल कर्म); हमारा कोई संबन्ध नहीं हैं) और वे किसी अन्य घाट पर ही रहे।
अडियेन् अमिता रामानुज दासी
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