श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:

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जब उनसे पूछा गया कि “इन व्यक्तित्वों में ये सिद्धांत कैसे दिखाई देते हैं?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं।

सूत्रं – १४५

श्री भरताऴ्वानुक्कु, नन्मैदाने तीमैयाय्त्तु; श्री गुहप्पॆरुमाळुक्कु तीमैदाने नन्मैयाय्त्तु।

सरल अनुवाद

श्रीभरतजी के लिए अच्छे गुण हानिकारक हो गए; श्री गुह महाराज के लिए बुरे गुण अनुकूल हो गए।

व्याख्या

श्री भरताऴ्वानुक्कु …

अर्थात् – श्रीभरतजी जो श्रीरामजी को पुनः अयोध्या लाना चाहते थे और उनका राज्याभिषेक करना चाहते थे, तथा इस प्रकार अपने वास्तविक स्वरूप के अनुरूप उनकी सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहते थे, जैसा कि श्रीरामायण के अयोध्या काण्ड १०१.१२ में कहा गया है “एपिश्च सचिवैस्सार्धम ‌ …” (इन मंत्रियों के साथ जो यहाँ हैं … मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ) – सम्पूर्ण यात्रा के समय उन्होंने श्रीराम को अयोध्या लाने के विषय में सोचा और बड़े दुःख के साथ श्रीराम के दिव्य चरणों में शरण ली, वह शरणागति का अच्छा कार्य स्वयं ही हानिकारक हो गया क्योंकि वह श्रीराम के दिव्य हृदय के अनुरूप नहीं था।

श्री गुह महाराज जो दुर्गुणों से परिपूर्ण थे, जैसा कि पेरिय तिरुमोऴि ५.८.१ में कहा गया है “एऴै एदलन् …” (सांसारिक सुखों का इच्छुक, द्वेषी), और जिन्हें श्रीराम ने स्वेच्छा से उनके पास आकर स्वीकारा क्योंकि श्रीराम ने उनके दोषों को उनका प्रसाद मानकर स्वीकार कर लिया, इसलिए, उनके पापमय दुर्गुण अनुकूल हो गए हैं।

पुण्य और पाप को अतिमानुष स्तवम्‌ में इस प्रकार परिभाषित किया गया है “यथावत्‌ प्रियं तदिह  पुण्यम् अपुण्यम् अनयत्‌ ” (जो भगवान को प्रिय है वह पुण्य है और बाकी सब पाप हैं); इसलिए पहले बताए गए दो सिद्धांत इन दो व्यक्तित्वों में देखे जाते हैं।

अडियेन् केशव रामानुज दास

आधार: https://granthams.koyil.org/2021/06/29/srivachana-bhushanam-suthram-145-english/

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