యతీంద్ర ప్రవణ ప్రభావము – భాగము 48

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః పూర్తి శ్రేణి << భాగము 47 ఈ శ్లోకములో చెప్పినట్లు.. యానియానిచ దివ్యాని దేశే దేశే జగన్నితేః తాని తాని సంస్థాని స్థాని సమసేవత (మార్గంలో, ఎమ్పెరుమాన్ ఎక్కడెక్కడ కొలువై ఉన్నాడో అక్కడక్కడి పెరుమాళ్ళ దివ్య తిరువడిని సేవించారు), తిరుమంగై ఆళ్వార్ తిరునెడుందాణ్డగం పాశురం 6 లో “తాన్ ఉగంద ఊరెల్లాం తన తాళ్ పాడి” (ఎమ్పెరుమాన్ ఆనందంగా కొలువై ఉన్న దివ్య … Read more

యతీంద్ర ప్రవణ ప్రభావము – భాగము 47

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః పూర్తి శ్రేణి << భాగము 46 కందాడై అణ్ణన్ ను ఆశ్రయించిన ఆండపెరుమాళ్ ఒకరోజు జీయర్ శుద్ధసత్వం అణ్ణాను పిలిచి “దేవరి వారు భాగ్యవంతులు, నమ్మాళ్వార్ల పట్ల మధురకవి ఆళ్వార్ ఉన్నట్లే, అణ్ణన్ పట్ల దేవరి వారు కూడా అంతటి ఇష్టపడే వ్యక్తి అయినారు. ఆచార్యుడు ఈ లోకంలో ఉన్నంత వరకే సేవ చేయగలము. అణ్ణన్ అవసరాలను తీర్చుచూ జీవించండి” అని ఆశీర్వదించారు. … Read more

యతీంద్ర ప్రవణ ప్రభావము – భాగము 46

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః పూర్తి శ్రేణి << భాగము 45 మాముణుల ఆశ్రయం పొందిన అణ్ణన్ ఈ క్రింది శ్లోకములో చెప్పినట్లుగా… రామానుజపదాంభోజ సౌగంధ్య నిదయోపియే అసాధారణ మౌన్నత్యమవధూయ నిజంధియా ఉత్తేజయంతః స్వాత్మానం తత్తేజస్సంపదా సదా స్వేషామతిశయం మత్వా తత్వేన శరణం యయుః (ఎమ్పెరుమానార్ల (రామానుజుల) దివ్య పాదాల మధుర పరిమళాన్ని నిధిగా పొందిన వారు, దివ్య తేజస్సు గల మాముణులను ఆశ్రయించి మరింత గొప్పతనాన్ని పొందాలని … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३६ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कृपाकर श्रीपेरुम्बुदूर् के लिये प्रस्थान किये  तत्पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपेरुम्बुदूर् के लिये प्रस्थान किये जैसे कि इस श्लोक में उल्लेख हैं  यतीन्द्रत्जननीम्प्राप्य पुरीं पुरुषपुङ्गवः।अन्तः किमपि सम्पश्यन्नत्राक्षीः लक्ष्म्णं मुनिम्॥ (पुरुषों में सबसे उत्तम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के जन्म स्थान … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३५ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कृपाकर वरदराज भगवान के मन्दिर जाते हैं  श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुमला से प्रस्थान कर राह में दो दिन के लिये विश्राम कर काञ्चीपुरम् में श्रीवरदराज भगवान की पूजा करने पहुँचे जैसे पाशुर में कहा गया हैं “उलगेत्तुम् आऴियान् अत्तियूरान् ” … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३४ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कुछ समय वहाँ विश्राम करने के पश्चात फिर आगे चढ़ने लेगे। यह सुनकर पेरिय केळ्वि जीयर्  स्वामीजी अन्य श्रीवैष्णव जन और सभी मन्दिर के कर्मचारी सहित बड़ी कृपा से भगवान श्रीवेङ्कटेश कि श्रीशठरी (जिसे पूवार्क​ऴल्गळ् भी कहते है), पेरीय … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३३ अब तिरुमला का वर्णन भाद्रपद महिने के पहिले दिन तिरुमला पर्वत पर ब्रह्मोत्सव प्रारम्भ होता हैं। उस दिन श्रीपेरिय केळ्वि जीयर् (पर्वत पर प्रधान आचार्य जो मन्दिर कि देख रेक करते हैं) को एक स्वप्न आया जब लोग उन्हें कहते हैं … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३२ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वेङ्कटाद्रि के लिये प्रस्थान किये  श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य मन में तिरुमला और अन्य उत्तर भारत के दिव्य स्थानों कि यात्रा कर वहाँ भगवान कि पूजा करने का विचार किया। उन्होंने श्रीरङ्गनाथ भगवान कि सन्निधी में जाकर भगवान कि … Read more

 यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३१ तत्पश्चात भगवान ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को श्रीतीर्थ, प्रसाद, श्रीशठारी और दिव्य पुष्पमाला प्रदान कर अलंकृत किया। वें ऐसे प्रसन्न हो गये जैसे कि उन्हें एक राजा के समान मुकुट और हार प्राप्त हुआ, यह सोचते हुए कि “हम श्रीरङ्गनाथ  भगवान के … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ३१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ३० तत्पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अन्यों के साथ श्रीशठकोप स्वामीजी के सन्निधी में गये जिन्हें श्रीमहालक्ष्मी के स्वामी तेन्नरङ्गन्  (श्रीरन्ङ्गनाथ​ भगवान) के दिव्य चरण कमलों के रक्षात्मक खड़ाऊँ माना जाता हैं। उन्होंने उनकी पूजा किये, परिभ्रमण तरिके के से भीतर गये, श्रीरन्ङ्गनाच्चियार्  के … Read more