श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम:
अवतारिका
कोई विशेष परिचय नहीं।
सूत्रं – २००
आरूड पतितन् आगैयाले।
सरल अनुवाद
क्योंकि वह एक ऊँचे पद से नीचे गिर गया है।
व्याख्या
इसका कारण [जो पिछले सूत्र में बताया गया है] यह है कि – ‘भागवतत्व’ (भगवान के भक्त होने) के महान पद पर पहुँचने के पश्चात भी, ‘भागवत-अपचार’ (भक्त का अपमान) में गहराई से लिप्त होकर बहुत नीच स्थिति में आ जाना। यही वह कारण है जिससे भगवान को अत्यंत क्रोध आता है जैसा कि वराह पुराण में कहा गया है – “पद्म कोटि शतानापि नक्षमामि कदाचन” (अर्थात्, जो मेरे भक्तों का अपमान करते हैं, उन्हें मैं सौ करोड़ वर्षों तक भी क्षमा नहीं कर सकता)।
अडियेन् केशव रामानुज दास
आधार – https://granthams.koyil.org/2021/08/23/srivachana-bhushanam-suthram-200-english/
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