யதீந்த்ர ப்ரவண ப்ரபாவம் – எளிய தமிழாக்கம் – பகுதி 4

ஸ்ரீ:  ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம:  ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம:  ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம: யதீந்த்ர ப்ரவண ப்ரபாவம் – எளிய தமிழாக்கம் << பகுதி 3 அச்சமயம் தேவராஜர் என்றொருவர் (நம்பூர் வரதராஜர் என்றும் அறியப்பட்டவர்) பாதுகை சக்ரவர்த்தி கோவில் அருகே வசித்து வந்தார்; அறிஞர் எளியோர் போன்ற அனைவராலும் விரும்பப்படுபவராக திகழ்ந்தார். அவர் மிகவும் இரக்க சுபாவத்தினராகவும் சத்வ குணங்கள் (தூய்மையான நற்பண்புகள்) கொண்டவராகவும் இருந்தார். ஒரு நாள் நஞ்சீயர் ஒரு கனவு கண்டார். அதில் தேவராஜரைக் … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ५३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ५२ तत्पश्चात जैसे इस श्लोक में कहा गया  अयं पुनः स्वयंव्यक्त अनवतारन् अनुत्तमान्।निधाय हृदिनीरन्तरं निद्यायन् प्रत्यभुत्यत​॥ विशेषेण सिशेवेच शेषभोग विभूषणम्।अमेयमात इमम्धामं रमेशं रङ्गशायिनम्॥ ध्यायं ध्यायं वपुस्तस्य पायं पायं दयोदतिम्।कायं कायं गुणानुच्चैस् सोयं तत्भूयसान्वभूत्॥ (अर्चावतार का ध्यान करते हुए बिना रुके श्रीवरवरमुनि … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ५२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ५१ एऱुम्बियप्पा के आराध्य देव चक्रवर्ती श्रीराम उनके स्वप्न में आकर उन्हें आज्ञा करें “आपने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति अपराध किया हैं जो आदिशेष के अपरावतार हैं। क्या तुम देवऋषि नारद की कथा नहीं सुनेहो ‘भगवद् भक्तसम्भुक्त​ पात्र शिष्टोधनारात् कोपिदासि सुतोप्यासि … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ५१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ५० एऱुम्बियप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शरण होते हैं  तत्पश्चात एक श्रीवैष्णव तिरुमला जाते समय एऱुम्बि में पधारे। अप्पा की दृष्टी उनपर पड़ी, उन्होंने उन्हे आमंत्रण दिया और उन्हें कृपाकर श्रीरङ्गम्  मन्दिर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के विषय में बताने को कहा। उन … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ५०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ४९ आऴ्वार्तिरुनगरि में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के कुटीर में आग लगना  श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का अक्षुण्ण यश और बढ़ती हुए विभूति को देखकर कुछ दुष्ट उनसे जला करते थे। एक दिन जब वें रात में अकेले अपने कुटीर में ध्यान लगाये हुए थे … Read more

యతీంద్ర ప్రవణ ప్రభావము – భాగము 80

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః పూర్తి శ్రేణి << భాగము 79 ఇళైయాళ్వాఅర్ పిళ్ళై మరియు రామానుజ దాసర్ యాత్రకు పూనుకొనుట చక్రవర్తి తిరుమగన్ (శ్రీ రాముడు) తన పాదుకలను భరతునికి ఇచ్చినప్పుడు, లక్ష్మణుడికి (ఇళైయ పెరుమాళ్) ఆ భాగ్యం కలుగలేదు. ఇళయ పెరుమాళ్ళ దివ్య నామం ఉన్న ఇళైయాళ్వార్ పిళ్ళై, జీయర్ పాదుకలను పొందినప్పుడు, వారు అందరికీ ఆనందాన్ని కలిగించారు. రామానుజ దాసరుకి న ఉత్తరీయం ఇచ్చినట్లే, … Read more

యతీంద్ర ప్రవణ ప్రభావము – భాగము 79

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః పూర్తి శ్రేణి << భాగము 78 ఉత్తర దివ్య దేశాల పెరుమాళ్ళను స్మరించిన పెరియ జీయార్ జీయర్ ఒకరోజు తెల్లవారు జామున తిరుమలయాళ్వార్ (కాలక్షేప మండపం) కు వెళ్లి, దివ్య దేశాలను స్మరించుచున్నారు. దీనమైన మనస్సుతో దాదాపు నాలుగు గంటల పాటు అలాగే దివ్యదేశాల నామ స్మరణ చేశారు. “సింధిక్కుం దిశైక్కుం తేరుం కై కూప్పుం”, “వెరువాదాళ్ వాయ్ వెరువి”, “ఇవఱిరాప్పగల్ వాయ్ … Read more

యతీంద్ర ప్రవణ ప్రభావము – భాగము 78

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః పూర్తి శ్రేణి << భాగము 77 తిరుమాలిరుంజోలై అళగర్ ఈ తనియన్ ప్రచారం చేసెను మణవాల మాముణుల తిరువడి సంబంధం ఉన్న ఒక జీయర్, అళగర్ తిరుమల (తిరుమాలిరుంజోలై) లో వివిధ కైంకర్యాలు చేస్తుండేవారు. అతను తమ ఆచార్యులు పెరియ జీయర్ల ఆత్మగుణాలను, విగ్రహగుణాలను నిరంతరం ధ్యానం చేస్తూ ఉండేవారు. అతను గుడి చుట్టూ ప్రదక్షిణలు చేస్తూ, అందరూ నిత్యం జపించగలిగే ఒక … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ४९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ४८ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और तिरुनारायणपुरम् आयि के मध्य में बैठक  जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कृपाकर आचार्य हृदयम् [श्रीशठकोप स्वामीजी के श्रीसहस्रगीति पर श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य​ के अनुज श्रीअऴगियमणवाळप्पेरुमाळ् ​ नायनार् द्वारा रचित गूढ संकलन] के २२वें सूत्र को समझा रहे थे तो जो वें अर्थ … Read more

यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् – भाग ४८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः यतीन्द्र प्रवण प्रभावम् << भाग ४७ जैसे श्लोक में कहा गया  यानियानिच दिव्यानि देशे देशे जगन्तितेः।तानि तानि सम्स्तानि स्थानि समसेवत॥ (राह में जहाँ जहाँ भगवान दिव्य स्थान पर निवास किये हैं उन्होंने उन सभी स्थानों पर उनके दिव्य चरणों कि पूजा किये) वें राह में सभी स्थानों … Read more