श्रीवचन भूषण – सूत्रं १६१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “शेषत्व (सेवा) जो आत्मा के लिए एक आभूषण है और शेषि (भगवान) द्वारा वांछित है, वह आनंद में बाधा कैसे बन जाता है?” तो श्री पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने कृपापूर्वक व्याख्या की। सूत्रं – … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १६०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी शृंखला << पूर्व​ अवतारिका इस (तीसरे) प्रकरणम्‌ (भाग) के प्रारंभ में, यद्यपि उपेयाधिकारम्‌ (कैंकर्य के लिए योग्यता) की व्याख्या की गई थी, वह केवल प्रासंगिक थी; अब इस प्रकरण के शेष भाग में, इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है और इस प्रकार … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इस कारण से [जैसा कि पिछले सूत्र में बताया गया है], यह पुरुषकार सभी प्रकार के प्रपन्नों [शरणागति करनेवालों] के लिए निश्चित रूप से वांछनीय है। सूत्रं – १५९ अधिकारि त्रयत्तुक्कुम्‌ पुरुषकारम्‌ अवर्जनीयम्‌। सरल अनुवाद तीनों प्रकार के … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका पूर्व [सूत्र १५६] में “ससाक्षिकम्‌ आगैयाले इप्पन्धत्तै इरुवरालुम्‌ इल्लै सॆय्यप् पोगादु” कहा गया था जो कि चेतन और ईश्वर दोनों का, साक्षी पुरुषकार [पिरट्टी] के प्रति नित्य पारतंत्र्यम् (शाश्वत, संपूर्ण निर्भरता) पर आधारित है; इसलिए, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके अतिरिक्त, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यह सिद्धांत वेद के अनुकूल है”। सूत्रं – १४९ इव्वर्त्तत्तै वेद पुरुषन्‌ अपेक्षित्तान्‌। सरल अनुवाद वेदपुरुष (वेदों का साक्षात रूप) इस [पिछले सूत्र में समझाया गया] सिद्धांत से सहमत हैं । … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके पश्चात, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी इस  [जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के सम्बन्ध को न छोड़ने का सिद्धांत, जो अम्माजी की गवाही में स्थापित किया गया था] सिद्धांत का प्रमाण दे रहे हैं । सूत्रं – १५७  “ऎन्नै … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका वह चेतन जिसने सदा भगवान से मुँह मोड़ लिया था, आज ही भगवान की ओर मुख (ईश्वर अभिमुख होना) किया है; क्या होगा यदि वह चेतन, भौतिक शरीर धारण करके इस संसार में लिप्त होने के कारण, बुरे … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इतना ही नहीं, इसका एक और लाभ भी है। (पुरुषकार) सूत्रं – १५५ अनित्यमान इरुवर्‌ पारतन्त्र्यमुम्‌ कुलैवदुम्‌ अत्ताले. सरल अनुवाद ऐसे पुरुषकार द्वारा दोनों की अस्थायी पारतन्त्र्यम् (अवलंबित होना) भी नष्ट हो जाएगी। व्याख्या अनित्यमान … अनित्यमान पारतन्त्र्यमुम्‌ … Read more

श्री रामायण तनि श्लोकम् – ५ – बाल काण्ड १९.१४ – अहं वेद्मि – भाग ४

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः पूरी श्रृंखला << भाग ४ अहं वेद्मि, (बाल काण्ड १९.१४); भाग ४ अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ।। १.१९.१४ ।। यह श्लोक विश्वामित्र महर्षि ने राजा दशरथ से कहा है। सरल अर्थ – मैं श्री राम को जानता हूँ … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी बताते हैं कि उन्होंने पहिले किस बात को “स्वरूप” के रूप में सुनिश्चित  किया था। सूत्रं – १५४ औपाधिकमुमाय्‌ नित्यमुमान पारतन्त्र्यम्‌ इरुवर्क्कुम्‌ उण्डिऱॆ। सरल अनुवाद दोनों की [श्रीजी के प्रति] आकस्मिक और स्वाभाविक निर्भरता है। … Read more