श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके अतिरिक्त, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यह सिद्धांत वेद के अनुकूल है”। सूत्रं – १४९ इव्वर्त्तत्तै वेद पुरुषन्‌ अपेक्षित्तान्‌। सरल अनुवाद वेदपुरुष (वेदों का साक्षात रूप) इस [पिछले सूत्र में समझाया गया] सिद्धांत से सहमत हैं । … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इसके पश्चात, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी इस  [जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के सम्बन्ध को न छोड़ने का सिद्धांत, जो अम्माजी की गवाही में स्थापित किया गया था] सिद्धांत का प्रमाण दे रहे हैं । सूत्रं – १५७  “ऎन्नै … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका वह चेतन जिसने सदा भगवान से मुँह मोड़ लिया था, आज ही भगवान की ओर मुख (ईश्वर अभिमुख होना) किया है; क्या होगा यदि वह चेतन, भौतिक शरीर धारण करके इस संसार में लिप्त होने के कारण, बुरे … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इतना ही नहीं, इसका एक और लाभ भी है। (पुरुषकार) सूत्रं – १५५ अनित्यमान इरुवर्‌ पारतन्त्र्यमुम्‌ कुलैवदुम्‌ अत्ताले. सरल अनुवाद ऐसे पुरुषकार द्वारा दोनों की अस्थायी पारतन्त्र्यम् (अवलंबित होना) भी नष्ट हो जाएगी। व्याख्या अनित्यमान … अनित्यमान पारतन्त्र्यमुम्‌ … Read more

श्री रामायण तनि श्लोकम् – ५ – बाल काण्ड १९.१४ – अहं वेद्मि – भाग ४

श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमते वरवरमुनये नमः श्रीमते रङ्गदेशिकाय नमः पूरी श्रृंखला << भाग ४ अहं वेद्मि, (बाल काण्ड १९.१४); भाग ४ अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ।। १.१९.१४ ।। यह श्लोक विश्वामित्र महर्षि ने राजा दशरथ से कहा है। सरल अर्थ – मैं श्री राम को जानता हूँ … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी बताते हैं कि उन्होंने पहिले किस बात को “स्वरूप” के रूप में सुनिश्चित  किया था। सूत्रं – १५४ औपाधिकमुमाय्‌ नित्यमुमान पारतन्त्र्यम्‌ इरुवर्क्कुम्‌ उण्डिऱॆ। सरल अनुवाद दोनों की [श्रीजी के प्रति] आकस्मिक और स्वाभाविक निर्भरता है। … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका इतना ही नहीं, मध्यस्थता का एक अन्य उद्देश्य भी है। सूत्रं – १५३ स्वरूप सिद्धियुम्‌ अत्ताले। सरल अनुवाद  इससे व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का भी ज्ञान होता है। व्याख्या स्वरूप … स्वरूप – चेतन के लिए यह … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “यद्यपि चेतन स्वाभाविक रूप से दास है और भगवान स्वाभाविक रूप से स्वामी हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे के पास सीधे पहुँच सकते हैं। किन्तु वे एक-दूसरे के निकट मध्यस्थों के माध्यम से क्यों … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “भगवान ने स्वतंत्र होते हुए भी इन विभूतियों (श्रीहनुमानजी और श्रीनिषादराज) को श्रीलक्ष्मणजी और माता सीता के माध्यम (मध्यस्थ/पुरुषकार) से उनसे सम्पर्क कर स्वीकार किया जैसा कि श्रीरामायण के किष्किन्धा काण्ड ३.२७ में … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १५०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “क्या ऐसे कोई व्यक्ति हैं जिनमें कोई कामना नहीं थी, परन्तु भगवान ने उन्हें स्वीकार कर लिया?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक उत्तर देते हैं। सूत्रं – १५० अपेक्ष निरपेक्षमाग तिरुवडिक्कुम्‌ श्री गुहप्पॆरुमाळुक्कुम्‌ … Read more