श्रीवचनभूषण – सूत्रं १४४

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “क्या हम इन दो सिद्धांतों [पिछले दो सूत्रों में समझाए गए] को कहीं भी प्रदर्शित होते हुए देख सकते हैं?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक समझाते हैं। सूत्रं – १४४ इवै इरण्डुम, श्री … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १४३

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका अब, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी उस अंतर को समझा रहे हैं जब भगवान स्वयं चेतन को स्वीकार करते हैं। सूत्रं – १४३ अवन्‌ इवनैप्पॆऱ निनैक्कुम्बोदु पातकमुम्‌ विलक्कन्ऱु सरल अनुवाद जब भगवान किसी चेतन को स्वीकार करना चाहते हैं, तो … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १४२

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका तत्पश्चात, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक प्रपत्ती के अनुपायत्व (साधन न होना) और उसके विपरीत, जो परगत स्वीकार (भगवान द्वारा अपनी इच्छा से स्वीकार किया जाना) है, को उपाय (साधन) समझा रहे हैं जिनकी व्याख्या पहले क्रमशः सूत्र ५४ … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४१

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक प्रपत्ति की महानता की व्याख्या करते हैं (फल और साधन एक ही होने के आधार पर)। सूत्रं  आगैयाले सुख रूपमाय् इरुक्कुम्। सरल अनुवाद अतः प्रपत्ति सुखदायक है। व्याख्या आगैयाले…… अर्थात् – क्योंकि जो सत्ता साध्य … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १४०

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका सूत्रं १३६ “पूर्ण विषयम्” से लेकर यहाँ तक, अतिरिक्त जानकारी दी गई है, किन्तु इससे पहिले प्रपत्ती की महानता का वर्णन किया जा चुका है। अतः प्रपत्ती की एक और महानता समझाने के लिए श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वमीजी कृपापूर्वक सिद्धोपाय … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३९

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “क्या भगवान के सुलभता से संतुष्ट होने के लिए कोई प्रमाण (शास्त्रों में प्रमाण) है?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने तदपश्चात समझाया। सूत्रं – १३९  “पत्रं पुष्पम्”, “अन्यत् पूर्णात्”, “पुरिवदुवुम् पुगै पूवे” सरल अनुवाद श्रीभगवद्गीता … Read more

श्रीवचनभूषण – सूत्रं १३८

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब उनसे पूछा गया कि “यद्यपि वह (भगवान) पूर्ण है क्या उसकी पूर्णता चेतन को यह सोचकर पीछे हटा देगी कि ‘हम अपनी शून्यता के कारण उन्हें कभी प्रसन्न नहीं कर सकते’?”  तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दयापूर्वक समझाते हैं। … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३७

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व जब पूछा गया कि “परंतु भगवान चेतन से कैसे प्रसन्न होंगे?” तो श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक समझाते हैं। सूत्रं १३७ आभिमुख्य सूचक मात्तिरत्तिले सन्तोषम् विळैयुम्। सरल अनुवाद चेतन के अनुकूल चित्त को देखकर ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। व्याख्या … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३६

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका जब पूछा गया कि “क्या कोई पूर्णतः इस बात पर विश्वास रख सकता है कि वह ही उपाय (साधन) है और आत्म-प्रयत्न से विमुख रह सकता है? क्या चेतन को भगवान को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी नहीं … Read more

श्रीवचन भूषण – सूत्रं १३५

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचल महामुनये नम: पूरी श्रृंखला << पूर्व अवतारिका यह प्रकट करने के लिए कि ये [पूर्व वर्णित] दोष प्रपत्ति में विद्यमान नहीं हैं, श्रीपिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी कृपापूर्वक प्रपत्ति के स्वरुप उचितत्व (स्वयं के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप होना) और सुकरत्व (करने में आसान) की व्याख्या करते हैं। … Read more